सापेक्ष, शरीर (स्वास्थ्य) सापेक्ष, वस्तु (संग्रह) सापेक्ष होना सर्वविदित है। न्याय मूल्य मूलक व्यवहार प्रमाण, धर्म सार्वभौम व्यवस्था प्रमाण और सत्य जीवन ज्ञान, सह-अस्तित्व दर्शन ज्ञान और मानवीयतापूर्ण आचरण ज्ञान के रूप में आवर्तनशील है। प्रमाण सदा ही पूर्णता और उसकी निरंतरता उस के फलन रूप में तृप्ति और उसकी निरंतरता होना पाया जाता है। तृप्ति के स्रोत में न्याय, धर्म, सत्य को और अतृप्ति के स्रोत में प्रिय, हित, लाभ को देखा जा सकता है अथवा मिलता है।

तृप्ति-अतृप्ति का कार्य रूप मानव में ही अध्ययन गम्य है। इसमें मुख्य बिन्दु हर व्यक्ति में तृप्ति का कार्य स्रोत होना ही जागृति है। ऐसा स्रोत जानने-मानने के रूप में देखा गया। यह हर व्यक्ति में निहित है। मूलत: जीवन सहज कार्य है। शरीर के द्वारा मानव परंपरा में यह सत्यापित हो पाता है। यह मुख्य बिन्दु पर मानव का जागृति ही सार्वभौमता का आधार है। - आ.व. 122-123

अनुभवगामी विधि में न्याय, धर्म (समाधान) और सत्य साक्षात्कार एक साथ ही होना पाया जाता है। (‘न्याय धर्म सत्य एक समूह है, अनुभव का। यह क्रम से साक्षात्कार होता है’ –संवाद २०१४) यह इस छोर से जुड़ा हुआ देखा गया है कि भ्रम से पीड़ित होने के साथ ही जीवन स्वीकृति सहज वस्तुओं की अति अनिवार्यता बन जाती है। इसी अनिवार्यतावश जीवन में इन्द्रिय लिप्सा से मुक्ति चाहने की आवश्यकता अपने पराकाष्ठा में बलवती हुआ रहता ही है। इसे योग-संयोग विधि से ही देखा गया है। यह संयोग अपने आप अस्तित्व सहज विधि से सह-अस्तित्व प्रणाली से नियति क्रम के रूप में समीचीन रहता है। यह पीड़ा और नियति सहज समीचीनता का संयोग ही है। ऐसी घटना सर्वप्रथम किसी एक व्यक्ति के साथ घटित होता है अथवा एक व्यक्ति के द्वारा उद्घाटित हो पाता है। इसी को हम अनुसंधान या अभ्यास का फलन नाम दिया करते हैं।

उक्त विधि से घटित अनुसंधान को शैक्षणिक विधि से लोकव्यापीकरण करना-कराना आवश्यकीय कार्य रहता ही है। अनुसंधान के अनन्तर यही अग्रिम-प्रक्रिया है। यह सर्वविदित है।

मूलत: यह घटना स्वयं अनुभव ही है। अनुभव सहज विधि से ही जागृति और जागृति का प्रमाण सहज रूप में समीचीन रहता है। इसलिये अनुभव के अनन्तर अनुभव की निरन्तरता होती ही है। यही अस्तित्व सहज वैभव के रूप में न्याय, धर्म, सत्य रूपी जीवन स्वीकृत वस्तु को देखा गया। सटीक देखने का भाषा ही है अनुभव क्रिया। ऐसे अनुभव में समाधान और न्याय समाहित रहता ही है। इसी प्रकार चिन्तन में अर्थात् साक्षात्कार क्रिया में समाधान और सत्य साक्षात्कारित रहता ही है। इतना ही नहीं व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी के अर्थ में जीने की स्थिति में न्याय, समाधान और सत्य व्यवहार में प्रमाणित रहता ही है। यही अनुभवमूलक अध्ययन है। अनुभवमूलक जीने की सम्पूर्णता मानव परंपरा में ही परमावश्यकता के रूप में दिखाई पड़ती है। इसकी समीचीनता अर्थात् भ्रम की पीड़ा और निर्भ्रमता या जागृति की समीचीनता, योग, संयोग की घटना विधि से सम्पन्न होना भी आवश्यक रहा। इसके अनन्तर ही इसके लोकव्यापीकरण की गति अपने आप शुरु होती है। यह स्वाभाविक रूप में सर्वमानव में स्वीकृत रहता ही है। जैसे न्याय सबको चाहिये, धर्म अर्थात् सार्वभौम व्यवस्था अखण्ड समाज होना चाहिये, सत्य समझ में आना चाहिये। क्योंकि ये जीवन सहज स्वीकृति होने के कारण इन्हें बिना समझे जीवन स्वीकारा ही रहता है। इसीलिये यह सबके लिए आवश्यक है। - आ.व. 144-146

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