सहज प्रमाणों का प्रामाणिकता नाम है। इस प्रकार पाँच शक्तियों का होना मानव को समझ में आता है। इसी प्रकार पाँच बलों की भी प्रामाणिकता है –

  • जागृत जीवन में अनुभव एवं उसकी निरंतरता क्रिया का नाम है आत्मा।
  • अनुभव के यथावत् बोध करने वाली अर्थात् पूर्णतया स्वीकार करने वाली क्रिया का नाम है बुद्घि।
  • अनुभव अनुसार न्याय, धर्म, सत्य को स्वीकार करने की निरंतरता को बनाए रखने वाली क्रिया चिंतन का नाम है चित्त।
  • साक्षात्कार किया गया न्याय धर्म सत्य को अनुभव मूलक विधि से तुलन करने वाली क्रिया का नाम है वृत्ति।
  • तुलन के अनुसार संपूर्ण मूल्य, चरित्र, नैतिकता की अपेक्षा अथवा आस्वादन करने वाली क्रिया का नाम है मन।

इस प्रकार पांच बल एवं पाँच शक्तियों का स्पष्टीकरण जीवन में होने वाली क्रिया के रूप में है।

जागृत मानव में प्रमाण अथवा सम्पूर्ण प्रमाण सहअस्तित्व रूपी अस्तित्व में अनुभव का ही प्रकाश है। अनुभव के प्रकाश में प्रमाण के अतिरिक्त कोई दूसरा वस्तु समाहित रहता ही नहीं। इसलिए प्रमाणों को परम, पावन, पूर्ण नामों से भी इंगित करते हैं। दूसरे क्रम में अनुभव प्रमाणों की परम स्वीकृति संकल्पों में, संकल्प का चित्रण इच्छाओं में, ऐसी चित्रणों का विश्लेषण विचारों में, ऐसे विचारों का आस्वादन मूलक विधि से चयन क्रिया आशाओं में सम्पादित होना समझ में आता है। अनुभवमूलक विधि से ये सभी दस क्रियाओं में निश्चयता स्पष्ट होती है।

जीवन ज्ञान सम्पन्नता विधा में यह अध्ययनगम्य वस्तु है। स्थिति क्रियायें अनुभवगामी और अनुभवमूलक विधि से अभिव्यक्त होना, और अनुभवमूलक विधि से प्रमाणित होना सार्थक है। मानव परम्परा में, से, के लिये तीसरा कोई सार्थक प्रक्रिया, विधि अस्तित्व में नहीं है। मानव सहज विधि से आवश्यकता के आधार पर यही परम होना पाया जाता है। मानव लक्ष्य ही परम आवश्यकता के रूप में पहचानने में आता है, समझ में आता है। फलत: मानव सचेष्ट होता हुआ भी देखने को मिलता है।

मानव लक्ष्य समाधान, समृद्घि, अभय, सहअस्तित्व है, यह अनुभवमूलक विधि से ही प्रमाणित होना पाया जाता है। अनुभव, जीवन सहज प्रमाण एवं वैभव क्रिया है। इसके आधार पर ही प्रमाण परम्परा मानव कुल में चरितार्थ होना समीचीन है। इसी क्रम में हमें निश्चयता को प्रमाणित करने का सौभाग्य स्पष्ट हो जाता है। यह हर नर नारी के लिए समीचीन है।

अनुभव ही जागृति और जीवन की परम अभिव्यक्ति, सम्प्रेषणा, प्रकाशन है। परम का तात्पर्य अनुभव से ज्यादा होता नहीं, जीवन उससे कम में अधूरा रहता है। अनुभव पूर्वक जीवन में तृप्ति होना पाया जाता है। जीवन तृप्ति अपने आप में मानव परम्परा में समाधान, समृद्घि, अभय के आधार पर सुख, शांति, संतोष के रूप में पहचानना होता है। सहअस्तित्व में अनुभव ही परम है, यही आनन्द है। इसका प्रमाण, मानव परम्परा में, से, के लिये परम है। इनका अर्थात् मानव लक्ष्य का मूल्यांकन प्रणाली, व्यवस्था में समाहित रहता है, यही न्याय सुरक्षा व्यवस्था है। न्याय सुरक्षा

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