पाता है कि, मनुष्येतर सभी संसार अपने आचरण रूपी फलन तथा उसकी निरंतरता के प्रति आश्वस्त रहता है। इसी क्रम में मानव, मानव सहज आचरण को पहचानने में, आदर्श को पहचानने में असमर्थ रहा।

सुदूर विगत से अब तक किए गए दो प्रकार के चिंतन भौतिकवादी चिंतन और आदर्शवादी चिंतन पर जितने भी प्रयत्न और प्रयोग मानव कर पाया, इसके फलन में निश्चय रूप में मानवीय आचरण, शिक्षा संस्कार और कार्य, न्याय विधान परम्परा में प्रमाणित नहीं हो पाया। इसलिए मानवीय आचरण का अनुसंधान एक आवश्यकीय मुद्दा बना ही रहा। इसी क्रम में मानव सहज बहुआयामी अभिव्यक्ति सहज आचरण को मानवीयतापूर्ण आचरण के रूप में पहचानना, मानव कुल के लिए एक आवश्यकता रही।

प्रत्येक मनुष्य का बहुआयामी, प्रवर्तनशील, कार्यशील, विचारशील और मूल्यांकनशील होना पाया जाता है। इतना ही नहीं, कल्पनाशील, अध्ययनशील, विश्लेषण और तुलनशील होना पाया जाता है। इन सभी प्रवर्तन, विचार, व्यवहार, कार्यों में कोई उद्देश्य भी होता है। इस प्रकार मनुष्य की प्रवर्तनशीलता, उद्देश्यों के आधार पर सफलता-विफलताओं को आकलित करना, पुन: सफलता के लिए प्रयत्नशील होना, मानव कुल प्रतिष्ठा के रूप में वैभव देखने को मिलता है। इस क्रम में मानव का निश्चित आचरण अथवा सार्वभौम आचरण (सभी स्वीकार सकें, ऐसा आचरण अथवा सभी में कोई आचरण समान रूप से वर्तता हो) को पहचानने का भी प्रयास रहा है। इन्हीं विधियों से, इन्हीं तमाम प्रवर्तनों को, भौतिकवादी विधि से, शरीर संवेदनाओं को आधार मानते हुए जब मानव में, मानसिकता का विश्लेषण किया गया, तब कामुकता आधार बना। कामुकता को सफल बनाने के लिए, बाकी सभी प्रवर्तनों को एक आवश्यकता माना गया, जिससे कामोन्मादिता प्रोत्साहित हुई। इसे कुछ लोग गौरव सहित स्वीकारते भी रहे, कुछ लोग अस्वीकारते भी रहे। यह प्रतिपादन विशेषकर भौतिकवादी चिंतन के आधार पर रहा है।

भौतिकवादी चिंतन ज्ञान ह्रास विधि का आकलन होने के कारण कामोन्मादी मनोविज्ञान भी, मानव कुल के लिए ह्रास का कारण बना जिसके परिणाम स्वरूप भोगोन्माद, लाभोन्माद-शोषण, द्रोह-विद्रोह और युद्घ मानसिकता बनते आया। - म.वि. 1-3

रहस्यमय ईश्वर केन्द्रित चिंतन के आधार पर ईश्वरीय शासन को परम मानते आए हैं। इसीलिए ईश्वरीय भय, ईश्वर के प्रतिनिधि रूपी राजा का भय, शक्ति केन्द्रित शासन का भय रहा और इसके साथ साथ प्रलोभन जुड़ा ही रहता है। चूंकि कोई भी भय के साथ, सोच नहीं पाता, कर नहीं पाता, जी नहीं पाता, फिर भी मानव विचार करते आया, काम करते आया, जीते आया। भय के साथ प्रलोभन का सहारा बना रहा तथा आस्थाओं का सहारा बना रहा। आस्थाओं का ध्रुव तीन तरीके से परिलक्षित हुआ - (1) ईश्वर और ईश्वर तुल्य व्यक्तियों के प्रति (2) राजा और संविधानों के प्रति (3) गुरुजनों और विविध प्रकार के साधनाओं के प्रति आस्थाएं अर्पित होती रहीं। इन सभी के मूल में स्वर्ग-नरक, पाप-पुण्य की चर्चा, सभी धर्म कहलाने वाली परंपराओं में प्रतिपादित रही हैं। जिसमें से पाप और नरक के प्रति भय और पुण्य तथा स्वर्ग के प्रति प्रलोभन रहा, इन दोनों से मुक्ति ही सर्वश्रेष्ठ स्थिति बताई जाती है। प्राय: सभी प्रकार के धर्म ग्रंथों में इस प्रकार की मानसिकता को देखा जा सकता है। - म.वि. 4-7

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