जागृति की आवश्यकता स्वयं ‘मध्यस्थ क्रिया’ का ही वैभव होना देखा गया है। आवश्यकता की आपूर्ति जीवन सहज अक्षय बल, अक्षय शक्ति सम्पन्नता सहित नियंत्रण रूपी ‘मध्यस्थ क्रिया’ में समाहित रहता है। इसका प्रमाणीकरण विधि और इसके उपयोग विधि और तृप्ति विधियों जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन सहज अध्ययन क्रम में लोकव्यापीकरण होना देखा गया।

जागृति क्रम तक ‘मध्यस्थ क्रिया’ की महिमा ही है जो जागृति के लिये आवश्यकता, अनिवार्यता को स्वयं स्फूर्त विधि से स्पष्ट करता आया है। सबसे समीचीन और सुलभ तथ्य यही है पदार्थावस्था से ज्ञानावस्था तक ज्ञानावस्था में जागृतिपूर्णता तक मानव को अध्ययन करने का अवसर और स्वयं का मूल्यांकन करने का अर्हता ये दोनों ऐश्वर्य एक साथ सर्वमानव के लिये सुलभ हो गया है। जागृति में, से, के लिये अध्ययन और उसकी आवश्यकता एवं अनिवार्यता मानव सम्मुख हो चुकी है।

मध्यस्थ क्रिया सहज न्याय और धर्म (सर्वतोमुखी समाधान) व्यवहार में फलित होना स्वाभाविक होता है और प्रामाणिकता के लिये अपरिहार्यता निर्मित हो जाती है। ‘क्रिया पूर्णता’ की स्थिति में ‘मध्यस्थ क्रिया’ की महिमा है। तात्विक रूप में इस को इस प्रकार से देखा गया है न्यायान्याय, धर्माधर्म, सत्यासत्य दृष्टियाँ भ्रम बन्धन से मुक्ति; श्रम का विश्राम; न्याय, धर्म, सत्य बोध होते ही स्वाभाविक रूप में प्रमाणित हो जाता है। इसी के साथ-साथ अनुभव की आवश्यकता अपने आप बलवती होता है। जीवन अपने में से व्यवस्था में भागीदारी सहज विधि को स्वीकार लेता है। यह सर्वदा के लिये संस्कार और बोध होना पाया जाता है। यही श्रम का विश्राम स्थिति है। -आ.व.(2000), 70-75

जीवन ही मानव शरीर द्वारा जागृति को प्रमाणित करने के क्रम में श्रम का विश्राम को मानव चेतना के रूप में स्पष्ट कर देता है। इसका प्रमाण समाधान = विश्राम = जागृति है। इस विधि से श्रम का विश्राम अर्थात् समाधान पद में ही मानवीयता पूर्ण समाज और व्यवस्था अपने अखंडता और सार्वभौमता के साथ वैभवित होना समीचीन है। ऐसी जागृतिपूर्वक परंपरा स्थापित होना और उसकी निरंतरता होना ही वैभव का तात्पर्य है। - क.द. 112-113

‘आचरणपूर्णता’ चैतन्य इकाई में व्यक्त होना, प्रमाणित होना नियति सहज अभिव्यक्ति होने के कारण ही है। परिणाम का अमरत्व, श्रम का विश्राम और गति का गंतव्य सह-अस्तित्व सहज जागृति विधि सहित अभिव्यक्त होना, इसी धरती पर सुस्पष्ट हो जाता है।

‘आचरणपूर्णता’ स्थिति में मध्यस्थ क्रिया का जागृति पूर्णता सहज अर्थात् सह-अस्तित्व में अनुभव सहित प्रभाव क्षेत्र में सम्पूर्ण जीवन अभिभूत हो जाता है। इसको ऐसा देखा गया है कि जागृतिपूर्ण होते ही अर्थात् अस्तित्व में अनुभव होते ही जीवन के सभी अवयव पूर्णतया अनुप्राणित हो जाते हैं अर्थात् अनुभव सहज विधि से अनुप्राणित हो जाते हैं। यही बुद्धि में ‘सहजबोध’ चित में ‘सहज साक्षात्कार’, वृत्ति में ‘सहज तुलन’ एवं मन में ‘सहज आस्वादन’ नित्य प्रतिष्ठा के रूप में होना देखा गया है। इस जागृति प्रतिष्ठा सम्पन्न जीवन में चयन प्रक्रिया प्रामाणिकता से, विश्लेषण प्रक्रिया प्रामाणिकता से, चित्रण प्रक्रिया प्रामाणिकता से, संकल्प प्रक्रिया प्रामाणिकता से अभिभूत अनुप्राणित रहना देखा गया है। यही जागृति पूर्ण जीवन में मध्यस्थ क्रिया की महिमा है। जिसकी आवश्यकता, अनिवार्यता, प्रयोजनीयता कितना है, कहाँ तक है? यह हर व्यक्ति मूल्याकंन कर सकता है।

Page 125 of 335