अनुसार वृत्ति के अनुरूप मन के कार्य करने की स्थिति में सुख मिलता है, जिसका प्रमाण स्वयं के प्रति विश्वास, श्रेष्ठता के प्रति सम्मान, प्रतिभा और व्यक्तित्व में संतुलन तथा व्यवहार में सामाजिक, व्यवसाय में स्वावलम्बी होने से है।

यह तभी संभव होता है जब वृत्ति, चित्त के अनुरूप; चित्त, बुद्घि के अनुरूप; बुद्घि, आत्मा के अनुरूप; आत्मा, अस्तित्व सहज सह-अस्तित्व के अनुरूप कार्य करने की स्थिति में और गति में प्रमाणित होता है। इसलिए चित्त के अनुरूप वृत्तियां तुलन और विश्लेषण संगीतीकरण विधि से, शांति सहज प्रमाण को देखा गया है। बुद्घि के अनुरूप कार्य करता हुआ चिंतन और चित्रण सत्यबोध सहज कार्यप्रणाली और प्रक्रिया में संगीतीकरण स्वयं संतोष के रूप में प्रमाणित होना पाया गया है। बुद्घि, आत्मानुरुपी विधि से, कार्यकलापों को संपन्न करती है, तब परम संगीत, आनंद के नाम से ख्यात होता है। आत्मा में, अस्तित्व के अनुरूप कार्य होना सहज है। यह सहजता, मानवीयता पूर्ण प्रामाणिकता सम्पन्न परम्परा की महिमा से सर्व सुलभ होता है। दूसरा, अनुसंधान विधि से भी संपन्न होता है। इस प्रकार बलों में संगीतीकरण प्रणाली से मन:स्वस्थता का प्रमाण और शक्तियों में संगीतीकरण प्रणाली से नैसर्गिक संतुलन, अखंड समाज में संतुलन, सार्वभौम व्यवस्था में संतुलन, मानवीय शिक्षा-संस्कार, स्वास्थ्य-संयम सहित न्याय-सुलभता, उत्पादन सुलभता, विनिमय-सुलभता सम्पन्न संस्कृति, सभ्यता, विधि व्यवस्था में संतुलन संभव है। - म.वि. 13–16

(I) अनुभव और जागृति की स्थिरता और निश्चयता

निश्चयता, स्थिरता सर्वमानव में चिराकाँक्षा के रूप में बनी ही है। सहअस्तित्व रूपी अस्तित्व, ज्ञान और स्वीकृति का आधार है। यह सर्वमानव में सर्वेक्षण पूर्वक विदित होने वाला तथ्य है। स्वयं को जाँचने से भी यही स्पष्ट होता है। हम सब स्थिरता व निश्चयता को ही स्वीकार करते रहे हैं, न कि अस्थिरता, अनिश्चयता को। स्थिरता के सहज आधार पर ही निश्चयता का होना स्वाभाविक है। विकास सहज निश्चयता, सर्वमानव में जीवन क्रिया के रूप में प्रमाणित है। जीवन की पाँच क्रियायें स्थिति के रूप में और पाँच गति क्रिया के रूप में सर्व मानव में अध्ययन होना स्वाभाविक है। अध्ययन करने वाला भी मानव ही है। अध्ययन के उपरान्त प्रमाणित करने वाला भी मानव, प्रमाणित रूप में जीने वाला भी मानव ही है। इस प्रकार मानव ही जागृति का प्रमाण है। जीवन क्रिया सर्वमानव में गति के रूप में चयन, विश्लेषण, इच्छा, संकल्प और प्रमाणों के रूप में होना पाया जाता है, इसे परावर्तन के नाम से भी जाना जाता है। इसी के साथ पाँच स्थिति क्रियायें आस्वादन, तुलन, चिंतन, बोध और अनुभव क्रिया के रूप में पाया जाता है। तभी मानव परम्परा अनुभव प्रमाण प्रमाणित होना पाया जाता है। जीवन की पाँच स्थिति क्रियाओं को बल के रूप में तथा पाँच गति क्रियाओं को शक्ति के रूप में व्यक्त करते हैं।

जागृत जीवन द्वारा संबंध उनके निर्वाह एवं प्रयोजनों के अर्थ में किया गया चयन का नाम - आशा, सुख से जीने की आशा, यह पहली जीवन शक्ति है। दूसरा, आशा के अनुरूप, अर्थात् जागृत जीवन सहज आशाओं के आधार पर विश्लेषण सम्पन्न होना ही विचार है। तीसरा, जागृत जीवन के विश्लेषण के अनुरूप चित्रण होते रहना ही इच्छा है। चौथा, जागृत जीवन के न्याय, धर्म, सत्यता को प्रयोजित, और व्यवहृत करने का नाम है ऋतम्भरा। पाँचवां, अनुभव

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