(2) जीवन परमाणु में, मध्य बिंदु में और आश्रित परिवेशों में, जितनी जितनी संख्या में अंश स्थित होना है, वह पूर्ण हुआ रहता है। इसकी कार्य-योजना “सह-अस्तित्व सहज’’ है, मानव सहज कार्य-योजना जागृति को प्रमाणित करना ही है।

(3) गठन पूर्ण परमाणु चैतन्य पद में होता है, जिसको जीवन नाम दिया गया है। ऐसे परमाणु अर्थात् जीवन परमाणु संक्रमण के साथ ही अणुबंधन मुक्ति, भारबन्धन मुक्ति और आशा बन्धन से युक्त होना पाया जाता है। यही बिंदु है - जीने की सहज आशा और आस्वादनापेक्षा उद्गमित रहती है।

(4) जीवन परमाणु अक्षय बल, अक्षय शक्ति सम्पन्न रहता है क्योंकि मात्रात्मक परिवर्तन, जीवन परमाणु में होता नहीं। यह अणुबंधन मुक्ति के साथ ही, आशा बन्धन महिमा स्वरूप देखा जाता है।

(5) जीवन परमाणु अपनी वर्तुलात्मक गति से अधिक कम्पनात्मक गति वैभव सम्पन्न होता है, यह भारबन्धन मुक्ति का फलन है। यही आशाबन्धन के साथ ही प्रवर्तन विधियों को, पहचानने, निर्वाह करने के कार्यक्रम को निर्धारित करता है। मनुष्येतर जीवों के कार्यकलाप (वंशानुषंगीयता के क्रम में) वंशानुषंगीयता का स्वरूप, कार्य, शरीर रचनानुषंगीय विधि से प्रमाणित रहता है। जीवन में आशा-चयन और आस्वादन में; विचार-तुलन और विश्लेषण में; इच्छाएं, चिंतन (साक्षात्कार) और चित्रण में; अवधारणा-बुद्घि बोध और संकल्प में; आत्मा-प्रमाण अनुभव और प्रामाणिकता में कार्यरत रहता है। इसका प्रमाण प्रत्येक जागृत मनुष्य ही है।

(6) प्रत्येक जागृत मनुष्य में ऊपर कहे गए सभी लक्षणों को अध्ययन करना संभव है इसमें और खूबी यही है कि जीवन सहज महिमा को स्वयं में अनुभव कर सकता है और मानव में ही सहज रूप में प्रमाणों को पा सकता है।

(7) जागृत मानव परम्परा में प्रत्येक मनुष्य, जागृति सहज प्रमाण है एवं स्वयं प्रमाणित होना चाहता है। सभी मनुष्यों से यही अपेक्षा है, अपितु प्रत्येक मनुष्य मनाकार को साकार करने वाला, मन:स्वस्थता का आशावादी है। यह परिभाषा प्रत्येक मनुष्य में देखने को मिलती है। मनाकार को साकार करने का तात्पर्य सामान्य आकांक्षा जैसे - आहार, आवास, अलंकारों सहित समृद्घि का अनुभव करने की आकांक्षा और महत्वाकांक्षा जैसे - दूरश्रवण, दूरगमन, दूरदर्शन साधनों से संपन्न होने की कामना स्पष्ट होती है। मन:स्वस्थता का तात्पर्य सुख, शांति, संतोष, आनंद और उसकी निरंतरता सहज स्थिति को वरण करना है।

(8) मानवापेक्षित परिवार मूलक, स्वराज्य व्यवस्था क्रम में, सम्पूर्ण सामान्य आकांक्षाएँ प्रमाणित होना एवं सुलभ होना संभव है। इसी के साथ महात्वाकांक्षा सम्बंधी उपयोग, सदुपयोग, प्रयोजनशीलता भी प्रमाणित होना सहज है।

(9) जीवन सहज रूप में बल और शक्तियां अक्षय हैं, अविभाज्य हैं और शाश्वत हैं। इनमें से बलों का नाम मन, वृत्ति, चित्त, बुद्घि और आत्मा और शक्तियों का नाम आशा, विचार, इच्छा, ऋतम्भरा और प्रामाणिकता दिया गया है। जीवन सहज बलों में संगीतीकरण ही, मन:स्वस्थता का सम्पूर्ण स्वरूप है। शक्तियों में संगीतीकरण ही व्यवहार में प्रमाणित होने का सूत्र है। मानव परम्परा में परस्परता और व्यवहार, एक सहज कार्यकलाप है। जीवन में अनुभव, मन:स्वस्थता का परम है क्योंकि अनुभव सत्य में, से के लिए होता है, उसका प्रमाण व्यवहार परम्परा में ही सार्थक होना संभव है। ऐसे बलों में संगीतीकरण को देखा (समझा) गया है कि जागृत जीवन सहज क्रिया व आचरण के

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