तात्विक रूप में ‘आचरण पूर्णता’ ही गंतव्य होने के कारण अस्तित्व ही नित्य वर्तमान और स्थिर होना अस्तित्व में अनुभव के फलन में सत्यापित होता है। यही सत्यापन सम्पूर्ण जीवन क्रियाकलापों में अनुप्राणन विधि में स्थापित हो जाता है अर्थात् आत्मा में हुई अनुभव से जीवन सहज सभी क्रियाएँ अनुप्राणित हो जाते हैं और अनुभव के फलन में तृप्ति अथवा आनन्द आत्मा में होना स्वाभाविक है।
यही तृप्ति जीवन के सभी क्रियाओं में जैसे पाँचों शक्तियाँ और चारों बलों में तत्काल ही अनुप्राणित हो जाती है। इस प्रकार सम्पूर्ण जीवन ही अनुभव सहज प्रतिध्वनि बन जाता है। यही तृप्त जीवन, ‘दिव्य जीवन’, ‘भ्रम मुक्त जीवन’, ‘जागृतिपूर्ण जीवन’ होना देखा गया है, समझा गया है। अस्तु! मध्यस्थ क्रिया के अनुरूप समूचा जीवन क्रियाकलाप होना ही जागृतिपूर्णता होना देखा गया है। इसी महिमावश जीवन में सम-विषमात्मक कार्यकलाप शून्य हो जाता है। इसी के लिये हर जीवन आतुर-कातुर, आकुल-व्याकुल रहता है। अतएव, मानव परंपरा में क्रियापूर्णता, आचरण पूर्णता सहज परंपरा की आवश्यकता है। आ.व., (2000), 70-75
गठनपूर्णता की मौलिकता है-अणुबन्धन और भारबन्धन मुक्ति और आशा, विचार, इच्छा बन्धन का प्रकाशन और इसी क्रम में आशा, विचार, इच्छा बंधन मुक्ति ही जागृति का स्वरूप है। फलस्वरूप जागृत जीवन का निश्चित कार्यकलाप मानवीयता और मानवीयता पूर्ण परंपरा है। ऐसी चैतन्य इकाई में मध्यस्थ क्रिया का स्वरूप और कार्य भी यथा स्थिति को बनाए रखने और जीवनी क्रम, जागृति क्रम और जागृति को अक्षुण्ण बनाये रखते हुए नित्य वैभव को नियंत्रित किये रहना ही परंपरा के रूप में मध्यस्थ क्रिया सहज मौलिकता है। - आ.व. 92
इस अभिव्यक्ति में मध्यस्थ सत्ता, मध्यस्थ क्रिया, मध्यस्थ बल, मध्यस्थ शक्ति, मध्यस्थ जीवन सहज प्रमाण ही मानव परंपरा का एकमात्र सहज मार्ग है। अतएव मानव परंपरा की अनिवार्यता सहज ही विदित होता है। अस्तित्व स्वयं नित्य सह-अस्तित्व है इसलिये जागृत जीवन सह-अस्तित्व में तृप्त होता है। ऐसी तृप्ति का बहुमुखी अभिव्यक्ति ही परंपरा के नाम से ख्यात होता है। अस्तु, मध्यस्थ जीवन, मध्यस्थ क्रिया, मध्यस्थ सत्ता, बल और शक्ति सहज वैभव के संबंध में प्रतिपादन और व्याख्याएँ प्रस्तुत हैं। यही मध्यस्थ दर्शन सह-अस्तित्ववाद है। - आ.व. 102-103
(H) जागृति ही प्रमाणों का आधार है
मानव परम्परा में जागृति ही प्रमाणों का आधार है। जीवन में जागृति मानव परम्परा में ही चरितार्थ रूप मानव का होना पाया जाता है। जीवन जागृति मानव शरीर द्वारा मानव परम्परा में प्रमाणित होती है। जीवन का तात्विक स्वरूप को गठन पूर्ण परमाणु चैतन्य इकाई के रूप में और रचनाओं को रासायनिक भौतिक रूप (और रचना) में समझा गया है कि -
(1) जीवन अपने स्वरूप में, गठनपूर्ण परमाणु है। गठनपूर्ण परमाणु का तात्पर्य है कि जिस गठन में, सम्पूर्ण परिवेश, मध्य में स्थित अंश अपने अपने में तृप्त हो।