अस्तित्व में प्रत्येक एक अपने “त्व’’ सहित व्यवस्था है और समग्र व्यवस्था में भागीदार है, यह समझ में आता है। समझने का तात्पर्य, जानने और मानने से है। अध्ययन में, से, के लिए मानव में से के लिए तीन मुद्दे देखने को मिलते हैं। देखने का तात्पर्य समझना है यह -
(1) अस्तित्व दर्शन (2) जीवन ज्ञान (3) मानवीयता पूर्ण आचरण ही है। ये तीन मुद्दे हैं। अस्तित्व सहज रूप में यह धरती अनन्त ब्रह्माण्डों अथवा अनंत सौर-व्यूहों में से एक सौर-व्यूह में स्थित है। यह धरती अपने आप समृद्घ होने के उपरान्त, मनुष्य से भी समृद्घ हुई है। इस धरती पर मनुष्य सहज अवस्थिति के अनंतर मानव, जो कुछ भी अपनी कल्पनाशीलता, कर्म-स्वतंत्रता के चलते, अभी तक भय, प्रलोभन, आस्थावादी परिकल्पना में उथल पुथल होना देखा गया, यह जागृति-क्रम घटना में गण्य है। “जागृति सहज अभिलाषा सहित, जागृति क्रम का प्रमाण होना पाया जाता है।’’ जागृत मानव के लिए ही, प्रमाणित होना वांछनीय है। प्रमाणित होने के क्रम में अभी तक सार्वभौम व्यवस्था, अखंड समाज की अपेक्षा बनी रही है, यह अभी भी अपेक्षित है।
भय, प्रलोभन, आस्था के अनंतर न्याय, समाधान और प्रामाणिकता, प्रकारान्तर से सभी मनुष्यों में अपेक्षित है। अपेक्षाएं मानव में कर्म स्वतंत्रता कल्पनाशीलता वश ही, बहती हुई देखने को मिलती हैं। यही मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान का अनुसंधान क्रम सूत्र है। – म.वि. 4-7
- <a id="_Toc218788284"></a>मानवीयतापूर्ण आचरण का स्वरूप
अस्तित्व में प्रत्येक इकाई अपने आचरण रूपी व्याख्या सहित ही अपने-अपने ‘त्व’ को प्रमाणित करता हुआ देखने को मिलता है। इसी क्रम में सम्पूर्ण जागृत मानव ‘मानवत्व’ को अपने आचरणपूर्वक प्रमाणित करना स्वाभाविक है, व्यावहारिक है और अपेक्षित है। मानव प्रकृति ही जीवन जागृति पूर्वक मानवत्व को आचरण में प्रमाणित करना होता है। अन्य प्रकृति यथा पदार्थावस्था में प्रकृति परिणामानुषंगीय विधि से अपने-अपने ‘त्व’ को आचरणों में प्रमाणित करता हुआ देखने को मिलता है। यथा दो अंश का परमाणु अपने निश्चित विधि से आचरण करता है। इसका तात्पर्य यह हुआ दो अंश वाले जाति के सभी परमाणु एक ही आचरण करते हैं। इसलिये इस प्रजाति के सम्पूर्ण परमाणुओं का आचरण एक ही है। इसी प्रकार 3, 4 या 5 आदि विभिन्न संख्यात्मक परमाणुओं का आचरण, अपने-अपने प्रजातियों में सम्पूर्णता के रूप में एक ही है। इसमें कोई व्यतिरेक होता नहीं है। परमाणुओं की अनेक प्रजातियाँ हैं। इसी क्रम में अणुओं में निश्चित प्रजाति के अणुओं का आचरण और निश्चित रचना का आचरण अक्षुण्ण होना पाया जाता है। जैसे विभिन्न तत्वों के परमाणुओं से रचित अणु, अणु रचित पिण्ड रचनाओं का आचरण सर्वदेश-सर्वकाल में एक ही होता है।
प्राणावस्था में सम्पूर्ण रचनाएँ प्राणकोषाओं से रचित रहना विदित है। ऐसे प्राण कोषाएं मूलत: समान होते हुए रचना में विविधता होना देखा गया। इसका नियंत्रण बीजानुषंगीय विधि से सम्पन्न होता हुआ दिखाई पड़ता है। बीजों के आधार पर वृक्ष, वृक्षों के आधार पर बीज प्रमाणित होना सर्वविदित है। इनके सम्पूर्ण आचरण अपने-अपने प्रजाति के सम्पूर्णता में एक ही होता है। जैसे-बेल, दूब, पीपल, कमल, गुलाब आदि सभी पेड़-पौधे वृक्ष, पुष्प, लता और