उन-उनमें विविध प्रजातियाँ बीज, वृक्ष, न्याय क्रम में नियंत्रित हैं। उन-उन प्रत्येक प्रजातियों के सम्पूर्ण एक-एक अपने आचरण के रूप में एक ही होते हैं।

जीव संसार अनेक प्रजातियों के रूप में दृष्टव्य है। प्रत्येक प्रजाति सहज जीव कितने भी संख्या में हों उन-उन का आचरण एक ही होना पाया जाता है। जैसे कुत्ता, बिल्ली, गाय, घोड़ा, गधा, हाथी आदि जीव संसार दृष्टव्य है। इन-इनके आचरणों में स्थिरता, संतुलन स्पष्ट दिखाई पड़ता है। ये जीव संसार वंशानुषंगीय विधि से नियंत्रित और संतुलित होना पाया जाता है।

इन तथ्यों के अवलोकन से यह पता लगता है कि सत्ता में सम्पृक्त प्रकृति रूपी सह-अस्तित्व ही पूरकता विधि से पदार्थावस्था, प्राणावस्था, जीवावस्था अपने में व्यवस्था, समग्र व्यवस्था में भागीदारी के रूप में होना अस्तित्व सहज वैभव नित्य वर्तमान है। इसी धरती में चारों अवस्थायें वर्तमान में दिखाई पड़ती हैं।

ज्ञानावस्था में मानव को स्वयं को पहचानने की आवश्यकता है। यह गौरवमय प्रतिष्ठा हर व्यक्ति में, से, के लिये स्पष्टतया समीचीन है। अभी मानव, जीवन-ज्ञान, अस्तित्व दर्शन ज्ञान सहज विधि से जागृत पद प्रतिष्ठा को पहचानना स्वाभाविक हो गया है। ज्ञानावस्था का तात्पर्य ही है जागृति पूर्वक ही ‘त्व’ सहित व्यवस्था को प्रमाणित करता है। परम्परा के रूप में करता ही रहेगा। जागृति क्रम से जागृति की स्वीकृति ही संस्कार है। संस्कार की परिभाषा भी यही है पूर्णता के अर्थ में अनुभव बल, विचार शैली, जीने की कलायें पुन: अनुभव बल के लिये पुष्टिकारी होना ही मानवीयतापूर्ण संस्कार प्रतिष्ठा ऐसा जागृति रूपी संस्कार ही मानव का स्वत्व स्वतंत्रता व अधिकार के रूप में है क्योंकि जीवन में ही जागृति का मूल्यांकन होता है। मानव परंपरा में जागृति प्रमाणित होती है। यही, प्रमाण परम्परा का तात्पर्य है।

अध्ययन, मानवीयतापूर्ण शिक्षा-संस्कार ही मानव को सदा-सदा के लिये जागृति व जागृति परम्परा के लिये समीचीन स्रोत है। ऐसे शिक्षा-संस्कार को हर मानव के लिये सुलभ होना मानव सहज अथवा मानवीयतापूर्ण मानव के पुरूषार्थ का मूल्यांकन है। इससे पता चलता है कि मानवीयतापूर्ण शिक्षा-संस्कार परम्परा मानव परम्परा का पुरूषार्थ है। पुरूषार्थ का तात्पर्य ही है, अपनी प्रखर प्रज्ञा और उसका निरंतर कार्य। ऐसा प्रखर प्रज्ञा मानव में ही प्रमाणित होता है। प्रधान रूप में यही मानव सहज मौलिकता पुरूषार्थ ही जागृति और जागृति पूर्णता का प्रमाण है। इसकी अभिव्यक्ति ही जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन ज्ञान है। ऐसे जागृति रूपी अथवा जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन रूपी जागृति को प्रमाणित करना ही पुरूषार्थ का प्रमाण है। इस विधि से हर मानव इसे अध्ययन विधि से जानना, मानना, पहचानना, निर्वाह करना ही जागृति और उसकी परम्परा है। निर्वाह करने के क्रम में ही आचरण, व्यवस्था, व्यवस्था में भागीदारी प्रमाणित होता है।

मानवीयता का स्वरूप - मानवीय आचरण है जो मूल्य, चरित्र, नैतिकता के रूप में प्रमाणित होता है। - स.श. 147

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