(iii) नैतिकता

मानवीयता पूर्ण आचरण में नीति का स्वरूप तन, मन, धन रूपी अर्थ का सदुपयोग और सुरक्षा के रूप में नैतिकता प्रमाणित होता है। - म.वि. 28-29

मूल्य चरित्र नैतिकता = ‘न्याय सूत्र’ = ‘व्यवस्था में भागीदारी’

  • मूल्य प्रधान विधि से परिवार व्यवस्था और
  • परिवार व समाज विधा में चरित्र प्रधान विधि से मूल्य और नैतिकता प्रमाणित होता है।
  • नैतिकता प्रधान विधि से समग्र व्यवस्था प्रमाणित होती है।

यह तीनों स्थितियाँ (मूल्य, चरित्र, नैतिकता) मानव में ही परिभाषित रहना पाया जाता है। मानव में यह परिभाषित होने के आधार को मानवत्व रूपी मूल्य, चरित्र, नैतिकता का सामरस्यता सूत्र में वर्तमान रहता हुआ देखा गया है, देखा जा सकता है। इसका प्रयोजन सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी को निर्वाह करना ही होता है। सार्वभौम व्यवस्था अपने में नैतिकतापूर्ण अखण्ड समाज संतुलन को सूत्रित-व्याख्यायित करता है। यही मानवत्व के संबंध में सम्पूर्ण अध्ययन का स्वरूप होना देखा गया है।

मूल्य, चरित्र, नैतिकता ही मानव में, से, के लिये न्याय सूत्र का आधार है। मानव में ही यह परस्पर अपेक्षा है, परस्परता में मूल्य, चरित्र, नैतिकता को मूल्याँकित करें। इसी मूल्याँकन विधि में उभयतृप्ति और अखण्ड समाज रचना सहज सूत्र देखने को मिला है। इस विधि से मूल्य, चरित्र और नैतिकता ही अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था का प्रमाण, सूत्र एवं व्याख्या है। – स.श. 132–150

मूल्य, चरित्र, नैतिकताएं अविभाज्य रूप में स्वायत्त मानव में प्रमाणित होने का क्रम ही आचरण है। मानव अपने स्वायत्त आचरण सहित ही कायिक, वाचिक, मानसिक, कृत, कारित, अनुमोदित रूप में सामाजिक होना प्रमाणित करता है।

जीवन जागृति आचरण पूर्वक प्रमाणित होता है

संबंधों के क्रम में मानव ऊपर कहे विधि से अपने जीवन सहज जागृति को प्रमाणित करता है। ऐसे सम्पूर्ण मूल्यांकन जीवन तृप्ति, व्यवहार प्रयोजन के ध्रुवों पर समीकृत होना पाया जाता है। जीवन तृप्ति का स्वरूप प्रामाणिकता के रूप में देखने को मिलता है। प्रामाणिकता अपने सम्पूर्णता में जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन ज्ञान और मानवीयतापूर्ण आचरण ज्ञान ही है। जीवन तृप्ति और उसका प्रमाण में, से, के लिये इससे अधिक या कम कुछ होता नहीं है। क्योंकि अस्तित्व स्वयं कम-ज्यादा से मुक्त है। जीवन ज्ञान भी कम और ज्यादा से मुक्त है। जीवन ही जागृतिपूर्वक अस्तित्व दर्शन करता है। अस्तित्व में जीवन भी अविभाज्य वर्तमान है। इसी परम सत्यतावश मानव में प्रमाणित होने की आवश्यकता, अवसर सहज ही नित्य समीचीन है क्योंकि अस्तित्व और अस्तित्व में जीवन नित्य वर्तमान रहा आया है। हर मानव

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