शरीर श्रेष्ठ रचना रूपी प्रकृति, विकासपूर्ण रूपी जीवन का संयुक्त साकार रूप में मानव तथा मानव परंपरा है। जीवन अपने जागृति को प्रमाणित करना ही मानव परंपरा में प्रधान कार्य है। जागृति को प्रमाणित करने के क्रम में सार्वभौम व्यवस्था, अखण्ड समाज ही साक्ष्य है। यही जागृति लोकव्यापीकरण होने का भी साक्ष्य है। - स.श. 81-85

4.2 विवेक

विवेक का तात्पर्य जीवन का अमरत्व, शरीर का नश्वरत्व, व्यवहार सहज (के) नियमों का अध्ययन और व्यवहार में प्रमाणित करने का, सहज क्रिया कलाप है। “जीवन का अमरत्व’’ - तात्पर्य परमाणु की गठनपूर्णता से है। गठनपूर्णता के अनंतर संक्रमण सहज, चैतन्य पद प्राप्त परमाणु, जीवन के नाम से ख्यात (प्रसिद्घ) हैं। ऐसे जीवन के अमरत्व ज्ञान (नित्य साक्षात्कार) जीवन-विद्या से मानव में स्थित जीवन की पुष्टि होती है। फलत: जीवन के प्रति जीवन का विश्वास, जीवन कार्यों के प्रति जीवन का ही विश्वास, जीवन प्रयोजन के प्रति जीवन का विश्वास पाया जाता है। जीवन सहज रूप में, पांच अक्षय बलों, पांच अक्षय शक्तियों का अंतर्सम्बन्ध और जीवन कार्य प्रयोजन के सम्बंध में पहले ही स्पष्ट किया जा चुका है। - म.वि. 22-28

बौद्धिक समाधान का फलन ही बौद्धिक, सामाजिक और प्राकृतिक नियम है। अस्तित्व में अनुभव का स्वीकृति ही अस्तित्व बोध और सर्वतोमुखी समाधान है। अस्तित्व अपने में सह-अस्तित्व के रूप में वर्तमान है; सदा नियमित और व्यवस्थित है। इसी सत्यतावश मानव भी व्यवस्था में, से, के लिए समाधानित और समृद्घि, अभय और सह-अस्तित्व को प्रमाणित करने की विधि बौद्घिक, सामाजिक और प्राकृतिक नियमों के रूप में सार्थक होना पाया जाता है।

नियमपूर्वक ही व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी अस्तित्व में दृष्टव्य है। - आ.व. 181

बन्धन वश ही मानव में तनाव और ग्रंथियाँ बनी रहती हैं। बंधन मुक्ति के अनन्तर तनाव रहित विधि से ही सम्पूर्ण कार्यकलाप सम्पन्न होते हैं। यहाँ यह भी बोध समन्वित होता है कि स्वभाव गति प्रतिष्ठा में ‘त्व’ सहित व्यवस्था अक्षुण्ण रह पाता है। मानव में स्वभाव गति मानवत्व ही होना स्पष्ट हो चुकी है। मानवत्व सहज सम्पूर्ण कार्य यथा बौद्घिक, सामाजिक और प्राकृतिक नियम मानव के स्वभाव गति प्रतिष्ठा में सहज रूप में निर्वाह होना पाया जाता है। इस प्रकार जागृति की आवश्यकता स्वभाव गति प्रतिष्ठा के लिये अनिवार्य है। बौद्घिक समाधान का ध्रुव अस्तित्व और मानव होने की स्वीकृति है। अस्तित्व में मानव ज्ञानावस्था की इकाई होने के कारण मानव और अस्तित्व के बीच चारों अवस्थाएँ अध्ययन के लिये वस्तु होना पाया जाता है। –आ.व. 185

मानव परम्परा में अखण्ड समाज-सार्वभौम व्यवस्था प्रमाणित होना ही परम प्रयोजन है। इस प्रयोजन और इसकी अक्षुण्णता क्रम में भागीदारी को निर्वाह करना ही विवेकपूर्ण विचार-कार्य-व्यवहार है। विवेचना कार्य ही विवेक है। न्याय-अन्याय, धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य ही विवेचना का स्वरूप है।

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