मानवीय दृष्टियां न्याय, धर्म (सर्वतोमुखी समाधान) तथा सत्य हैं। इसी के आधार पर अर्थात् जीवन प्रकाश प्रभावशील होने की स्थिति में ही समाज न्याय, सार्वभौम व्यवस्था और प्रामाणिकता सहज सुलभ हो जाती है। यही अमानवीयता से मानवीयता की ओर गति भी है। यही मानव की वांछा, आशा व आकाँक्षा है।
सम्बन्धों को पहचानने व मूल्यों का निर्वाह करने के क्रम में, समाज न्याय का उभय तृप्ति के रूप में लोकव्यापीकरण होता है। तभी मानव, परिवार व्यवस्था के रूप में, जीने की कला को, अभिव्यक्त कर पाता है। ऐसी स्थिति में सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी कर पाता है। सार्वभौम व्यवस्था का सूत्र, परिवार-मूलक विधि से सूत्रित होकर, ग्राम-स्वराज्य में सार्वभौम स्वराज्य व्यवस्था का छोटा रूप प्रमाणित होता है। यही “परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था” होने का सूत्र और संभावना है। - म.वि. १२०
तन मन धन का सदुपयोग = समाज नीति = धर्म नीति
उसकी सुरक्षा = स्वराज्य नीति = राज्य नीति और नैतिकता
- 1990 I [A] FC/33
मानवीयतापूर्ण आचरण का तीसरा आयाम चरित्र है। चरित्र का स्वरूप स्वधन, स्वनारी/स्वपुरूष, दयापूर्ण कार्य-व्यवहार के रूप में पहचाना गया है। चरित्र का क्रियाकलाप ‘सामाजिक नियम’ के रूप में सम्पन्न होना पाया जाता है। समाज शब्द से अखण्डता इंगित तथ्य और उसका कार्य स्वरूप जीवन सहज पूर्णता (जागृति) को शरीर रूपी माध्यम से मानव परंपरा में प्रमाणित करना ही है। मानवीयतापूर्ण आचरण से हर व्यक्ति सम्पन्न होना, सार्थक होना मानव के लिये स्वत्व रूप में समीचीन है ही। इसी के साथ-साथ हर मानव में इसकी आवश्यकता का भास-आभास बना ही है।
(i) स्वधन का परिभाषा है - अर्थात् कार्य रूप है प्रतिफल, पारितोष और पुरस्कार से प्राप्त धन। मूलत: धन का स्वरूप उपयोगिता और सुन्दरता मूल्य सम्पन्न वस्तुओं के रूप में होना पाया जाता है। जैसे आहार, आवास, अलंकार, दूरदर्शन, दूरश्रवण और दूरगमन रूपी वस्तुएँ हैं। इन सबमें उपयोगिता मूल्य, कला मूल्य को मानव ही मूल्यांकित करता है। ऐसी सभी वस्तुएँ (धन) मानव सहज श्रम नियोजन पूर्वक सम्पन्न हुआ होना पाया जाता है। ऐसा धन किसी का भी स्वत्व रूप में होता है, प्राकृतिक ऐश्वर्य पर नियोजन किया गया श्रम के फलन में ही स्पष्ट होता है। ऐसे फलन को ही श्रम का प्रतिफल है। पारितोष भी किसी का स्वधन होना स्वाभाविक है। अपने स्वधन को स्वयं स्फूर्त प्रसन्नता में, से, के लिये हस्तांतरित करना, अर्पित करने की क्रिया को पारितोष है। पुरस्कार से प्राप्त धन किसी सार्थक घटना, कार्य, प्रमाण, प्रकाशन, अभिव्यक्ति, संप्रेषणा प्रकाशन के फलस्वरूप उत्सव का अनुभव करता हुआ एक से अधिक लोग एकत्रित होकर ऐसे धन को अर्पित करने की क्रिया है। इन तीनों प्रकार से प्राप्त धन स्वधन की संज्ञा में आता है। तन, मन के साथ ऐसे स्वधन को सदुपयोग, सुरक्षा करने का अधिकार हर मानव में होता है।