प्राकृतिक क्षेत्र
१. प्राकृतिक सम्पत्ति (खनिज वनस्पति तथा पशु) का उनके उत्पादन के अनुपात में व्यय। | १. प्राकृतिक सम्पत्ति का उत्पादन से अधिक व्यय (अतिरिक्त व्यय) |
२. प्राकृतिक संपत्ति के उत्पादन में विघ्न न उत्पन्न करना। | २. उत्पादन से कम व्यय करना।(अनाव्याप्ति व्यय) |
३. उत्पादन में सहायक बनना। | ३. उत्पादन में विध्न डालना। |
उपरोक्तानुसार विधि एवम् निषेध को मूल आधार मानकर समस्त अर्थ – तन एवम् धन – की सुरक्षा की नीति निर्धारित होनी चाहिए -व्य.द. 1978, 172-73
(*व्यवहार के नियमों को ‘विवेक’ के अंतर्गत भी दिया है)
(*राज्य नीति पर शेष चर्चा व्यवस्था के सन्दर्भ में '6.6 विधि एवं व्यवस्था', अध्याय -६ में दिया है )
- मानवीयता के लिये आवश्यकीय नियमपूर्वक किये गये समस्त राज्यनीति एवम् धर्मनीति सम्मत व्यवहार को नैतिक तथा अमानवीयता पूर्वक किये गये व्यवहार को अनैतिक संज्ञा है। - व्य.द. 71
- नैतिकता पूर्वक ही मानव व्यवस्था में भागीदारी को निर्वाह कर पाता है।
- मानवीयतापूर्ण चरित्र पूर्वक व्यवहार करता है।
मूल्य और मूल्यांकन पूर्वक जी पाता है अथवा सम्बन्ध, मूल्य, मूल्यांकन, उभय तृप्ति पूर्वक जी पाता है। यही सुख, सुन्दर, समाधान पूर्वक जीने की कला का स्वरूप है। - आ.व. 175
अभी तक मानव ने समुदाय चेतना तक ही अपने को जागृति क्रम में भ्रमित रूप में पाया है। समुदाय चेतना में, अपने पराए की दीवाल बनी ही रहेगी। ऐसी दीवाल जब तक रहेगी, तब तक युद्ध-शोषण, द्रोह-विद्रोह की प्रक्रियाएं बनी ही रहेंगी। ऐसी प्रक्रियाएं अपने आप में अमानवीयता का द्योतक हैं। अमानवीय मानसिकता पूर्वक, अखंड समाज, सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी संभव नहीं है। इसलिए अमानवीयता से मानवीयता में संक्रमित होना ही आज की आवश्यकता है। अमानवीय चार प्रवृत्तियां विषय, संग्रह, सुविधा और भोग में ग्रसित रहना पाया जाता है।