वृत्ति और चित्त में सामरस्यता का स्वरूप शांति, चित्त और बुद्घि में सामरस्यता का स्वरूप संतोष तथा बुद्घि और आत्मा में सामरस्यता का स्वरूप ही आनंद सहज नामों से जाना जाता है। अनुभवमूलक बोध को आनंद के रूप में पहचाना गया है। इसी क्रम में अनुभवमूलक क्रम में किया गया चिंतन, तुलन, सहज रूप में ही जीवन के अंतर्संबंधों में सामरस्यता फलस्वरूप आनंद, संतोष, शांति और सुख जीवन मूल्यों के रूप में वैभवित होना पाया जाता है। यही जीवन मूल्य व्यवहार में मानव लक्ष्य के रूप में समाधान, समृद्घि, अभय और सह-अस्तित्व में अनुभव सहज प्रमाण के रूप में प्रमाणित होना पाया गया है। यही अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था का सूत्र है। - अ.श. 192–193
उल्लेखनीय तथ्य यही है कि सार्वभौम उद्देश्य समाधान, समृद्घि, अभय, सह-अस्तित्व है। प्रत्येक मानव का जीवन सहज उद्देश्य भी समान है यह है जीवन जागृति। हर मानव जागृतिपूर्वक ही अपने को ज्ञान, दर्शन, विज्ञान, विवेक सम्पन्नता सहित मानवीयतापूर्ण आचरण सहित जीने की कला को वरता है। इस प्रकार जागृति ही अनुभव, विचार, व्यवहार (परिवार और समाज) और व्यवस्था में जीने के स्वरूप में प्रमाणित होना पाया जाता है। – अ.श. 233
(A) प्रचलित: विज्ञान एवं शिक्षा
शिक्षा में जैसे ही यांत्रिक, तकनीकी विज्ञान, आकलनात्मक शिक्षा आरंभ होती है, वैसे ही मानव संतान में प्रचलित शिक्षा को प्रबोधन पूर्वक स्मृति के आधार पर परीक्षण विधि को अपनाते हुए विद्यार्थियों को विद्वान घोषित किया जाता है। आदि काल से पुस्तक और स्मृति को दुहराना विद्वता मानी जाती रही है। अभी इस दशक में, बहुतायत लोगों में यह स्मृति विकसित हो चुकी है, नकारने के रूप में - (१) स्मृति विद्वता नहीं है। (२) पुस्तकें विद्वता नहीं हैं (३) विज्ञान विद्वता नहीं है। कुछ विज्ञानी इस पक्ष में हैं कि सम्पूर्ण विज्ञान और तकनीकी में, पारंगत होने के बाद भी, बेहतरीन समाज का प्रणेता न हो पाने, परिवार सहज संगीत और समाधान रूपी लय से वंचित रहने के आधार पर, विज्ञान को मानव संतुष्टि का सम्पूर्ण ज्ञान नहीं है - ऐसा मूल्यांकन है। इसके मूल में यह भी विश्लेषण आता है कि भौतिकी विधि से किए गए सूक्ष्म अनुसंधान के उपरान्त भी, मानव और जीवन, व्याख्या और सूत्र से रिक्त है। इसका खेद भी वैज्ञानिक, व्यक्त करते हैं और कुछ विज्ञानी यह भी कहते हैं कि जो कुछ भी विकास होना है, वह इसी विधि से होना है और सूक्ष्मतम अनुसंधानों से, जितनी भी काली दीवालें सम्मुख हैं वे दूर हो जावेंगी। सर्वेक्षण से यह पता लगता है कि विज्ञान परस्त सभी आदमी, विज्ञान से ही “प्रकृति रूपी सत्य समझ में आता है’’ - ऐसा दावा करते हैं।
२०० वर्ष की अवधि में ही ५०% से अधिक विज्ञानी (इतना ही नहीं) श्रेष्ठ प्रतिभा सम्पन्न विद्यार्थियों में से ५०% अधिक लोग, आज की स्थिति में, काली दीवालों को भांप लिए हैं। क्योंकि वैज्ञानिक प्रयोग किये जाते हैं। उससे प्राप्त फल, परिणाम को अंतिम नहीं माना जाता है। अंतिम सत्य को समझा हुआ विज्ञानी मानव के सम्मुख प्रस्तुत नहीं हुआ है। विज्ञान विधि से हटकर, अनुसंधान करने का आधार ही, न रहने की स्थिति में परम्परा सहज गति में घुल जाते हैं अथवा मिल जाते हैं अथवा दब जाते हैं। इन तीनों स्थितियों में अतृप्ति की पीड़ा बनी ही रहती है। इस कुण्ठाग्रस्त बिन्दु के उत्तर में, अस्तित्व मूलक मानव-केन्द्रित चिंतन, पूरकता उदात्तीकरण, रचना, विरचना और विकास,