न्यायपूर्ण व्यवहार = सुख

मन तथा वृत्ति का निर्विरोध = सुख

नियमपूर्ण व्यवहार = सुख

सुख की निरंतरता = शान्ति

वृत्ति व चित्त का निर्विरोध = शान्ति

न्यायपूर्ण विचार = शांति

शान्ति की निरंतरता = संतोष

चित्त व बुद्घि का निर्विरोध = संतोष

समाधानपूर्ण (धर्मपूर्ण) इच्छा = संतोष

संतोष की निरंतरता = आनन्द

बुद्घि व आत्मा का निर्विरोध = आनन्द

सत्यपूर्ण संकल्प = आनंद

आनंद की निरंतरता = परमानन्द

परम सत्य रूपी सह-अस्तित्व में अनुभूति = परमानन्द। ऐसी अनुभूति ही चैतन्य प्रकृति का चरमोत्कर्ष विकास है। यही परमानंद है।

नियम पूर्ण व्यवसाय, न्यायपूर्ण व्यवहार एवं धर्मपूर्ण विचार = मानवीयतापूर्ण जीवन व अतिमानवीयता की ओर स्पष्ट संभावना एवं अध्ययन

मानवीयतापूर्ण जीवन व अतिमानवीयता की स्पष्ट संभावना एवं अध्ययन = निर्भ्रम ज्ञान

निर्भ्रम ज्ञान = विवेक सम्मत विज्ञान

विवेक व विज्ञान = बौद्घिक समाधान व भौतिक समृद्घि

भौतिक समृद्घि एवं बौद्घिक समाधान = सह-अस्तित्व - अ.द. 44–45, व्य.द. अध्याय १७

सह-अस्तित्व में जीवन मूल्य, मानव मूल्य आवर्तित होता है। प्रामाणिकता सहज विधि से जीवन मूल्य सफल होता हुआ देखा गया है। सार्वभौम व्यवस्था क्रम में मानव मूल्य सहज सार्थक होना स्पष्ट है और अखण्ड समाज में भागीदारी स्वयं समाज मूल्य यथा स्थापित मूल्य, शिष्ट मूल्य, उपयोगिता मूल्य, कला मूल्य आवर्तनशील होना पाया जाता है। – अ.श. 136

सम्पूर्ण अर्पण-समर्पण क्रम से शिष्ट मूल्यों में वस्तु मूल्यों को, स्थापित मूल्य में शिष्ट मूल्यों को, मानव मूल्यों में स्थापित मूल्यों को, जीवन मूल्यों में मानव मूल्यों को अर्पित-समर्पित होता हुआ क्रम में देखा गया है। इसे हर व्यक्ति देख सकता है। जीवन मूल्य का स्वरूप सुख, शांति, संतोष और आनंद है। यह मन और वृत्ति के सामरस्यता में सुख,

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