प्रामाणिकता सहज गति और आस्वादन, तुलन, चिन्तन, बोध एवं अनुभव सहज स्थिति के संयुक्त रूप में रहता ही है। इन्हीं का किसी न किसी स्थिति या गति सहज प्रकाशन शरीर के द्वारा सम्पन्न होता ही रहता है। इसी प्रकार यह धरती अपने स्थिति सहज रूप में अपने धुरी में गतित रहते हुए सूर्य के सभी ओर अपने गतिपथ में आरूढ़ रहता हुआ दिखाई पड़ता है। यह सौर व्यूह अपने में एक व्यवस्था के रूप में दृष्टव्य रहते हुए, अनेक सौर व्यूह के साथ सह-अस्तित्व सहज स्थिति-गति को और पूरकता को प्रमाणित करता ही है। इसका प्रमाण यही है एक अनेक पर और अनेक एक पर प्रतिबिम्बित प्रमाणित है ही।

अस्तित्व में स्वभाव-गति और उसकी निरंतरता के लिये सम्पूर्ण पूरकता स्पष्ट है। पूरकता विधि से ही मानव भी स्वभाव-गति में, धरती भी स्वभाव-गति में होना सहज है। जैसा मानव परम्परा हर मानव के पूरक होने के प्रमाण में ही हर मानव जागृत होता है, हो सकता है। इसी प्रकार यह धरती अन्य ग्रह-गोलों के पूरकता के प्रमाण स्वरूप विकसित हुआ होना पाया जाता है। धरती के विकास का तात्पर्य यही है अथवा हर धरती के विकास का तात्पर्य इतना ही है चारों अवस्था में प्रकृति प्रमाणित है। जैसे-इस धरती पर पदार्थ, प्राण, जीव एवं ज्ञान अवस्थाएँ प्रमाणित हैं ही। इन चारों अवस्था में पूरकता और उसकी निरन्तरता के लिये मानव में मानवीयतापूर्ण आचरण अनिवार्य स्थिति है। मानव अपने पूरकता को अन्य प्रकृति के साथ और मानव प्रकृति के साथ प्रमाणित करने के क्रम में ही व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी प्रमाणित हो पाता है। इसी विधि से मानव से आशित, प्रतीक्षित, अभिप्सीत व्यवस्था परंपरा इस धरती पर स्थापित और फलित होना सहज है।

‘सम्पूर्ण मानव समुच्चय’ एक क्रिया है। इसी का नामकरण है ‘मानवीयतापूर्ण क्रिया’। मानवीयतापूर्ण क्रिया सहज प्रमाण है। मानव परंपरा सहज चारों आयामों में यथा शिक्षा, संस्कार, संविधान और व्यवस्था में मानवीयता निरंतर रूप में अथवा परंपरा के रूप में प्रमाणित रहना। इस प्रकार मानवीयता उक्त चारों आयामों में क्रियाशील रहना ही परंपरा रूपी गति सार्थक होना पाया जाता है। दूसरे विधि से प्रत्येक जागृत मानव अपने विचार और अनुभव समुच्चय विधि से स्थिति है और व्यवहार तथा प्रयोग विधि से गति है। तीसरा-जागृत जीवन सहज रूप में आस्वादन, तुलन, चिन्तन, बोध, अनुभव स्थिति है और आशा, विचार, इच्छा, संकल्प, प्रामाणिकता के रूप में निरंतर गति है। सम्पूर्ण मानव समाज के रूप में स्थिति है और व्यवस्था के रूप में गति है। चौथे विधि से-सत्ता में संपृक्त रूप में अस्तित्व नित्य स्थिति है और सह-अस्तित्व नित्य गति है।

प्रत्येक अणु, प्रत्येक परमाणु के अणु-बंधन सहज स्थिति और भार बन्धन सहज गति है। सम्पूर्ण अणुएँ रचना के रूप में स्थिति और परिणाम परिवर्तन की ओर गति दिखाई पड़ती है। प्रत्येक वनस्पतियाँ अपने रूप और गुण के अनुसार गति एवं स्वभाव-धर्म के अनुसार स्थिति में होना पाया जाता है। सम्पूर्ण जीव भी रूप और गुण के आधार पर गति और स्वभाव एवं धर्म के आधार पर स्थिति में होना पाया जाता है।

मानव अपने मूल्यों के रूप में स्थिति, सम्बन्ध और व्यवहार के रूप में गति का होना पाया जाता है। समाधान के रूप में स्थिति एवं व्यवस्था के रूप में गति है।

मूल्यों के धारकता के रूप में स्थिति और वाहकता सहित मूल्यांकन के रूप में गति, जागृत दृष्टि के रूप में स्थिति, दर्शन के रूप में गति, जीवन के रूप में स्थिति, प्रामाणिकता के रूप में गति। उद्देश्यों के रूप में स्थिति, कार्य-व्यवहारों

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