हर वस्तु उपयोगिता के आधार पर मूल्यांकित होता है। सभी उपयोगिताएँ महत्वाकांक्षा-सामान्याकांक्षा के रूप में परिगणित होते हैं। इन सभी मूल्यांकन की सफलता समृद्घि के अर्थ में होना ही लक्ष्य है। यह हर परिवार मानव का स्वीकृत लक्ष्य है। समाधानपूर्वक ही समृद्घि का प्रमाण होना पाया जाता है। समाधान सदा-सदा तन, मन, धन रूपी अर्थ का सदुपयोग इसके फलन में सुरक्षा ही है। इस प्रकार सदुपयोग सुरक्षा के बिन्दुओं के आधार पर ही तृप्ति बिन्दु और उभय तृप्ति नित्य प्रमाण होना पाया जाता है। इसी आधार पर हर स्तरीय परिवारों में उत्पादन और समृद्घि का मूल्यांकन होना सहज है। सदुपयोग धर्म सूत्र से; सुरक्षा राज्य सूत्र से संबंध रहता है।

उपयोगिता और कला मूल्य का मूल्यांकन होना सहज है। इसी मूल्यांकन क्रिया को श्रम मूल्य का नाम दिया। - अ.श. 137

उत्पादन का सुगमतापूर्वक वांछित वस्तु व सेवा में परिवर्तित होना ही विनिमय की चरितार्थता है। लाभ मूलक वाणिज्य प्रक्रिया उसके विपरीत स्थिति का निर्माण करती है। यही सत्यता मानव को श्रम-विनिमय-पद्घति को सर्वसुलभ बनाने के लिये प्रेरित है। - अ.द. 65–67

इसी क्रम में संपूर्ण मानव परिवार विनिमय कार्य को निर्वाह करने का अवसर, आवश्यकता और उसका प्रयोजन सार्थक होता है। विनिमय कार्य सार्थक होने का तात्पर्य लाभ-हानि मुक्त विधि से प्रत्येक वस्तु श्रम मूल्य सहज विधि से मूल्यांकन सहित आदान-प्रदान होने से है। प्रत्येक मानव अपना शोषण नहीं चाहता है, इस प्रकार सर्वमानव शोषण नहीं चाहता है। जागृति पूर्वक लाभ-हानि मुक्त विनिमय व्यवस्था सार्थक होता है। यह मानव परंपरा में मौलिक अधिकार है। हर परिवार अपने आवश्यकता से अधिक उत्पादन, श्रम-मूल्य, मूल्यांकन और उभय तृप्ति विधि से विनिमय कार्य को संपन्न करना अर्थात् वस्तु का आदान-प्रदान करना मौलिक अधिकार पाया जाता है। विनिमय कार्य में प्रधान सूत्र श्रम मूल्य का मूल्यांकन करना ही है। विनिमय सुलभता का अर्थ में सभी प्रकार के सार्थक आवश्यकीय वस्तुएं कोष के रूप में सतत्-सतत् बनाए रखना कोष कार्य का गति है। कोष विनिमय को संतुलित बनाये रखता है। फलस्वरूप श्रम मूल्य का मूल्यांकन कला मूल्य और उपयोगिता मूल्य के आधार पर संपन्न होना पाया जाता है जिसके आधार पर हर परिवार अपने समृद्घि को व्यक्त करने में समर्थ हो पाता है। - स.श. 242

उत्पादन को दूसरी वस्तु व सेवा में बदलने के लिये अपनाई गई सुगम पद्घति ही विनिमय है, जिसकी सफलता के लिये प्रत्येक स्थान पर प्रत्येक आवश्यकीय वस्तु का सहज-सुलभ होने के लिये केन्द्रों का होना आवश्यक है। उत्पादन-कार्य जितना महत्वपूर्ण है उतना ही उसके सहायक तत्व संरक्षण भी महत्वपूर्ण हैं। संरक्षण के अभाव में सशंकतावश, साधनों के अभाव में उत्पादन सामग्रियों की असंपूर्णतावश, शिक्षा के अभाव में अक्षमतावश, विनिमय के अभाव में दूसरी वस्तु व सेवा में परिवर्तित करने के विघ्नवश उत्पादन में क्षति होती है। व्यवस्था का प्रत्यक्ष रूप में से उत्पादन एवं उसके सहायक तत्वों को सर्वसुलभ बनाना है। विधि का शुद्घ रूप ही सामाजिक मूल्यों यथा जीवन मूल्य, मानव मूल्य, स्थापित मूल्य व शिष्ट मूल्य का संरक्षण एवं संवर्धन है। ऐसी शुद्घ व्यवस्था के अंगभूत श्रम नियोजन एवं श्रम-विनिमय-पद्घति द्वारा सफल होने की पूर्ण संभावना है क्योंकि प्रत्येक मानव शोषण के विरुद्घ है। प्रत्येक मानव न्याय का याचक है। प्रत्येक मानव सही करना चाहता है। प्रत्येक मानव भौतिक समृद्घि एवं बौद्घिक समाधान से संपन्न होना चाहता है। साथ ही प्रत्येक वस्तु में निश्चित श्रम नियोजन होता है। प्रत्येक वस्तु का किसी एक वस्तु की अपेक्षा में

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