• विपरीत मानव जाति एक होने की सहज गवाही प्रत्येक मानव में पाई जाने वाली कल्पनाशीलता और कर्म स्वतंत्रता है। जिसको प्रत्येक व्यक्ति में समझा जा सकता है।
  • दूसरा प्रत्येक मानव मनाकार को साकार करने वाला, मन:स्वस्थता का आशावादी और प्रमाणित करने वाला है। यह प्रत्येक व्यक्ति में सर्वेक्षित होता है। इस महिमा की समानता के आधार पर भी मानव जाति का एक होना समझ में आता है।
  • तीसरा, मानव कर्म करते समय स्वतंत्र, फल भोगते समय में परतंत्र है- यह पाया जाता है। प्रत्येक मानव कर्म फलों में, से उसी को वरता है, जो सुख के रूप में परिणित हो जाते हैं। वही कर्म फल सुख के रूप में परिणित होते हैं जो समाधान रूप में होते हैं। क्योंकि प्रत्येक मानव का प्रत्येक कर्म फल समस्या या समाधान के रूप में ही प्रमाणित होता है। इन प्रक्रियाओं में भी मानव को समानता के रूप में देख सकते हैं। यह भी मानव जाति के एक होने का आधार है, साक्षी है।

''मानव धर्म एक, मत अनेक”- प्रत्येक मानव सुखी होने के लिए विचार, व्यवहार और अनुभव करने के क्रम में दिखता है। मानव सहज रूप में किये गये सभी कर्मों का फल सुख या दुख में ही परिणित होता है। इसे भली प्रकार से समझा गया है। यह सबको समझ में आता है। इसके साथ यह भी देखा गया है कि न्याय, समाधान (धर्म), सत्य सहज जितने भी कार्य, व्यवहार हैं, उनका परिणाम तत्काल एवं निरन्तर सुख के रूप में ही दिखाई देता है। इसका मूल तथ्य यह है कि :-

(1)

  • न्याय स्वयं मूल्य और मूल्यांकन के रूप में संबंधों में समाधान = सुख है।
  • व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी = समाधान = सुख है।
  • अस्तित्व दर्शन, जीवन ज्ञान के रूप में सत्य नित्य समाधान =नित्य सुख है।

ऐसा देखा गया है यह प्रत्येक मानव को समझ में आता है। इन तथ्यों में प्रत्येक व्यक्ति सहज रूप में प्रमाणित हो सकता है। अस्तु, मानव जाति को मानव धर्म के आधार पर ही अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था के रूप में मानव के एक होने से सत्य को समझ सकता है। इस प्रकार मानव धर्म सुख है। ऐसा सुख जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन, मानवीयता पूर्ण आचरण सहज रूप में है। सर्वतोमुखी समाधान मानव सहज ''स्वत्व” हो जाता है। इसके प्रमाण में व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी अपने आप न्याय, उत्पादन, विनिमय संबंधी समाधान हैं, फलस्वरूप मानव सुखी होता है।

(2)

  • परिवार मूलक विधि से परिवार मानव होने के प्रमाण के रूप में, संबंधों की पहचान, मूल्यों का निर्वाह करता है, फलस्वरूप समाधान होता है।

मानव, मानवीय शिक्षा-संस्कार पूर्वक, जीवन-ज्ञान और अस्तित्व दर्शन सहज जागृति संपन्न होता है। फलस्वरूप सर्वतोमुखी समाधान जैसे- अस्तित्व में सह-अस्तित्व, विकास, जीवन, जीवन जागृति, रासायनिक-भौतिक

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