विश्व व्यवस्था सहज रूप में ही मानव कुल को सुलभ होता है। इसे प्राप्त कर लेना ही मानव परंपरा की अक्षुण्णता, सम्प्रभुता, प्रभुसत्ता, मानवीयता सहज प्रबुद्घता है। इसे हम मानव जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन ज्ञान और मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान सहज मौलिकता के आधार पर प्राप्त कर सकते हैं। इससे मानव कुल को ग्रसित द्रोह, विद्रोह, शोषण और युद्घ संबंधी सभी विकार दूर हो जावेंगे। समुदाय चेतना से अखण्ड मानव समाज चेतना में प्रत्येक मानव को संक्रमित होना मानव परंपरा सहज प्रणाली से सहज सुलभ हो जाता है। यही मानव परंपरा में निरंतर समाधान, सुख, सौंदर्य सहज उत्सव हैं। इस विधि से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि समुदाय परंपरा में मतों के आधार पर (अर्थात् भीड़) मान्य हुआ है। जबकि अस्तित्व सहज रूप में मानव समाज होना सहज ही समझ में आता है।

मानव जाति एक है यह मूलत: मानव धर्म के आधार पर आधारित है। कर्म के आधार पर आधारित जातियाँ क्लेशों का पुलिंदा हो गई। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि मानव धर्म के वैभव में ही मानव जाति की एकता, अखण्डता समझ में आती है। मानव जाति की समानता के आधारों को ऊपर विविध प्रकार से समझाया गया है। - भ.व. 250-265

6.4 धर्म, समाज और राज्य अविभाज्य हैं

“नैतिकता का तात्पर्य धर्म, राज्य नीतिपूर्ण आचरण है। यही क्रम से सदुपयोग और सुरक्षा है”।-डायरी, 1983 [D] FC /61

अखण्ड समाज का स्वरूप “परिवार विधि” से

सार्वभौम व्यवस्था का स्वरूप “सभा विधि” से चरितार्थ होना देखा गया है। - ज.व. 281

  • राज्य के साथ समाज और धर्म अविभाज्य वर्तमान है। धर्म के साथ समाज और राज्य अविभाज्य वर्तमान है। समाज के साथ राज्य और धर्म अविभाज्य वर्तमान है। मानव धर्म का मूल रूप में सर्वतोमुखी समाधान है, इसके लिए मानव परंपरा में परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था प्रस्तावित है। जिसका फलन समाधान, समृद्घि, अभय और सह-अस्तित्व सहज प्रमाण है। राज्य, समाज और धर्म अलग अलग नहीं हो पाते। भाषा के रूप में कई तरीके से बात कर सकते हैं पर होता है वही जो अस्तित्व में है। अस्तित्व में मानव का होना, पहले स्पष्ट हो चुका है। मानव का स्वरूप स्वायत्त रूप में, परिवार के रूप में, ग्राम व विश्व परिवार के रूप में पहचान सकते हैं। मूलत: मानव की पहचान अर्थात् व्यक्ति की पहचान पहले कर लें अथवा विश्व मानव को पहले पहचान लें। इनकी पहचान से यह पता चलता है कि सर्वप्रथम एक समझदार मानव को पहचानना अति अनिवार्य है। यह भी समझ में आता है कि प्रत्येक मानव आकार के रूप में विविध है। मानव को पहचानने का आधार क्या होगा? यह प्रश्न स्वाभाविक रूप में विचारशील व्यक्तियों में उपजता ही है।
  • इसका उत्तर खोजने पर पता चलता है कि हर वस्तु की पहचान उस-उस के आचरण पर ही निर्भर है। आचरणों को योग, संयोग, वियोग के आधारों पर पहचाना जाता है। एक दूसरे का मिलन, योग है। पूर्णता के अर्थ में सार्थक योग, संयोग है। वियोग वह है कि योग और संयोग पहले से थी उससे छूट गए। इस प्रकार वियोगात्मक आचरण के आधार
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