मानव सह-अस्तित्व में अनुभवपूर्वक दृष्टा पद प्रतिष्ठा के आधार पर ही व्यवस्था का प्रमाण है। मानव ही समझदारी पूर्वक हर कार्य, व्यवहार, विन्यास को, विचारों को, व्यवस्था के रूप में अभिव्यक्त कर पाता है। समझदारी के बिना कल्पनाशीलता, कर्म-स्वंतत्रता का प्रयोग अपने आप में सर्वाधिक समस्याओं को पैदा कर लेता है।

यही मानव में भ्रमवश होने वाली समस्याओं का कारण है कल्पनाशीलता को विचारों में भी प्रयोग करता है। तब वांङ्गïमय, साहित्य को भी प्रस्तुत करता है। इसी के आधार पर कला, साहित्य के नाम से भी कल्पनाएँ दौड़ पड़ती हैं।

(2) राज्य, धर्म का मूल रूप:-

मानव में कल्पनाशीलता, कर्म-स्वतंत्रता का संपूर्ण कर्माभ्यास, व्यवहार अभ्यास की परिणति समाधान चाहना है। इसी विधि से शोध प्रक्रिया सहज संभव हो जाती है। इस प्रकार मानव का समाधान की ओर अपेक्षित रहना सहज है। इसी आधार पर प्रत्येक मानव समाधान को वरता (शोध या अनुसंधान करता) है। इस ढंग से राज्य और धर्म का मूल रूप समझदारी व्यवस्था है। व्यवस्था की अभिव्यक्ति सहज रूप में सर्वतोमुखी समाधान है। समाज रूप में संबंधों, मूल्यों को पहचानना तथा मूल्यांकन करने की विधि से समाधानित होना पाया जाता है। यही मानव धर्म है। यह जागृति का प्रमाण है। जागृति स्वयं समाधान और उसकी निरंतरता है। जागृति का प्रयोजन अस्तित्व में प्रत्येक एक के प्रति जागृत होने से है। जागृति का तात्पर्य जानने, मानने, पहचानने, निर्वाह करने से है। यह जीवन ज्ञान सहित सह-अस्तित्व में अनुभव है। पदार्थावस्था के रूप, गुण, स्वभाव, धर्म को जानना, मानना, पहचानना, निर्वाह करना यह पदार्थावस्था के प्रति जागृति है। इसी प्रकार प्राणावस्था, जीवावस्था, ज्ञानावस्था में उन-उन के रूप, गुण, स्वभाव, धर्म के प्रति जागृत होना ही मानव के जागृत होने का प्रमाण है। इन प्रमाणों के साथ ही प्रत्येक मानव को वर्तमान में विश्वास होना प्रमाणित होता है।

(3) सभी अपने ''त्व” सहित व्यवस्था है, जो सह-अस्तित्व है;

क्योंकि अस्तित्व न घटता है न बढ़ता है:- जागृति पूर्वक ही मानव व्यवस्था है और वह व्यवस्था में भागीदार होता है, यह मानव धर्म है। क्योंकि लोहा अपने लोहत्व सहित; गाय गायत्व के साथ; दूब दूबत्व के साथ व्यवस्था है और समग्र व्यवस्था में भागीदार है। इसी प्रकार मानव मानवत्व के साथ व्यवस्था है और समग्र व्यवस्था में भागीदारी संपन्न होना ही मानव के सह-अस्तित्व का प्रमाण है। सह-अस्तित्व सहज रूप में ही व्यवस्था है। इस प्रकार मानव धर्म, व्यवस्था और सह-अस्तित्व स्वाभाविक रूप में, अस्तित्व सहज धर्म का ही प्रकाशन है। सह-अस्तित्व नाम है इसीलिए नाम से नामी का निर्देश हो जाना, संप्रेषणा की सफलता है। नामी का स्वरूप है - सभी व्यवस्था सहित वर्तमान है, जिसमें मानव का भी अविभाज्य होना समझ में आता है। इस प्रकार - ''व्यवस्था एक समग्रता सहित अभिव्यक्ति है” जिसमें जागृत मानव दृष्टा सहज प्रमाण है।

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