पर कोई समाज रचना नहीं होती है। अब संयोग और योग की बात आता है। अभी तक जो कुछ भी आदमी, परिवार और समुदाय के रूप में दिख रहा है, ये सब योग के रूप में ही दिख रहा है, संयोग के रूप में नहीं। योग से कम स्थिति में अर्थात् वियोग की स्थिति में मानव स्पष्ट नहीं हो पाता है। कम से कम योग के आधार पर ही आचरणों को पहचानना संभव हो पाता है। इन्हीं आधारभूत तथ्यों के आधार पर परीक्षण संभव हो पाता है। मूलत: मानवीयतापूर्ण आचरण में सार्वभौम रूप स्पष्ट है।
सामाजिकता औपचारिक तथ्य नहीं है अपितु जागृति पूर्वक जीने की शैली है। वह केवल वास्तविकता पर आधारित क्रियाकलाप है। वास्तविकताएं ही नियति-क्रम, नियति क्रम ही विकास, विकास ही अभ्युदय, अभ्युदय ही व्यावहारिकता एवं व्यावहारिकता ही सामाजिकता है। व्यवहार संस्कृति, सभ्यता और विधि-व्यवस्था का योगफल है। मानव जीवन का आद्यान्त कार्यक्रम इसी चतुर्दिशा में वैभव है।
- विधि अनुभव को,
- संस्कृति विचार को,
- सभ्यता व्यवहार को,
- व्यवस्था उत्पादन विनिमय को स्पष्ट करती है।
यह प्रमाण सिद्घ है। यही ‘‘मूल्य-त्रय’’ को प्रकट करता है। - अ.द. 68
जीने की कला का:
- संस्कृति –> बौधिक रूप,
- सभ्यता –> पार्थिव रूप ,
- विधि –> नियामन रूप,
- व्यवस्था –> आशवस्थता व विश्वस्थता देता है
- डायरी 1982 a fc/24
धर्म और राज्य का मूल रूप
(1) अस्तित्व = सह-अस्तित्व
अस्तित्व का सह-अस्तित्व के रूप में होना ही सूत्र और चार अवस्थाओं में होना ही नियति सहज व्याख्या स्वरूप है। इस प्रकार अस्तित्व ही सम्पूर्ण वस्तु है, जागृत जीवन ही दृष्टा है तथा मनुष्य ही दृष्टा पद को प्रमाणित करने योग्य होता है।