राज्य और धर्म एक दूसरे के पूरक होते हैं; समाज ही धर्म का स्वरूप है; व्यवस्था ही राज्य है; धर्म का संतुलन राज्य से, राज्य का संतुलन धर्म से होना स्पष्ट किया जा चुका है। धर्म का स्वरूप ही अखण्ड समाज है। अखण्ड समाज सूत्र से सूत्रित परिवार है। इस विधि से जागृत परिवार सूत्र से सूत्रित अखण्ड समाज है। इसी प्रकार परिवार अपने में एक व्यवस्था, प्रसन्नता और उत्साह का मुखरण है। - ज.व. 238-241

6.5 धर्मनैतिक व्यवस्था

(A) अवधारणा

धर्म नीतिक व्यवस्था = संस्कृति + सभ्यता (संवाद, २००८)

संस्कार क्रम = संबंधों का पहचान क्रम

  • सम्बन्ध निर्वाह क्रम = संस्कृति, सभ्यता
  • संस्कृति = संस्कारों का कला -साहित्य रूप, अधिकतम मानस रूप में, मानव मूल्यों का प्रतिरोपण प्रक्रिया, मानव के सच्चरित्र का स्मरण में लाना अथवा अवतरित करना
  • सभ्यता = संस्कृति का अभिव्यक्ति क्रम, संस्कृति का व्यवस्था स्वरूप में वर्तमान होना, अधिकतम कार्य रूप में व्यक्त होता है
  • संस्कृति + सभ्यता = समाज सहज चरित्र
  • - डायरी 1986 AB FC/279, 1983 [D] FC /57
  • मानव समाज या व्यवस्था द्वारा, प्रत्येक सम्बन्ध एवम् सम्पर्क का निर्वाह करते हुए, मानवीयता के संरक्षण के लिये किए गए समस्त:

अध्ययनात्मक प्रयास को ‘संस्कृति’ संज्ञा है

तथा इसके आचरण, प्रचार और प्रदर्शन-पक्ष की ‘सभ्यता’ संज्ञा है I

  • संस्कृति का पोषण सभ्यता से, सभ्यता का पोषण *विधि (कानून) से विधि का पोषण व्यवस्था से तथा व्यवस्था का पोषण संस्कृति से है, जो अन्योन्याश्रित है I - व्य.द. (१९७८) ६२
  • पूर्ववर्णित सम्बन्ध एवम् सम्पर्क में तारतम्यात्मक व्यवहार पक्ष के आनुषंगिक मानव का, विभिन्न विभूतिपरक एवम् स्थितिपरक अध्ययन आवश्यक तथा वांछनीय है। अस्तु, सभी मानव आबाल-वृद्ध निम्न बारह स्थिति में गण्य है। ये सभी सुखी होना चाहते हैं। सुख भी नियम से, दुःख भी नियम से होना सिद्ध हुआ है।

अतः निम्न बारह स्तर में पाये जाने वाले मानव किन नियम-सिद्ध प्रक्रिया द्वारा सुखी होना पाए जाते हैं, उसका स्पष्टीकरण निम्नानुसार है - यह सब व्यवहार सम्पर्कात्मक है -

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