• बलवान दयापूर्वक सुखी होता है,
  • बुद्धिमान विवेक तथा विज्ञान पूर्वक,
  • रूपवान सत् चरित्रता पूर्वक,
  • पदवान न्याय पूर्वक,
  • धनवान उदारता पूर्वक,
  • विद्यार्थी निष्ठा पूर्वक,
  • सहयोगी कर्त्तव्य पूर्वक
  • साथी दायित्व पूर्वक
  • तपस्वी संतोष पूर्वक,
  • लोक सेवक स्नेह पूर्वक,
  • सहअस्तित्व में प्रेम पूर्वक मानव सुखी होता है।
  • रोगी तथा बालक के साथ आज्ञा पालन के रूप में सुखानुभूतियाँ सिद्ध हुई हैं।

उपरोक्तानुसार व्यवहार करने में समस्त मानव पाँचों स्थितियों में सफल हो जाय, यही धर्म-नैतिक व्यवस्था का कार्यक्रम व उद्देश्य है तथा शोषण के लिए प्राप्त समस्त प्रवृत्तियों का समूल निराकरण, मात्र उपरोक्तानुसार प्रतिष्ठित आचरण से ही संभव है। – व्य.द. 127-129

(B) संस्कृति

मानव समाज का स्वरूप अपने अखण्डता में प्रमाणित होना स्पष्ट किया जा चुका है क्योंकि समुदाय समाज होता नहीं, समाज समुदाय होता नहीं। समाज और उसका वैभव अनुभवमूलक प्रणाली से किया गया अभिव्यक्ति विन्यास, विचार विन्यास, व्यवहार विन्यास और कार्य विन्यास ही है। विन्यास का तात्पर्य विवेक सहित न्यायपूर्वक किया गया संप्रेषणा है।

जागृति पूर्वक ही सम्पूर्ण उत्सव समारोह सार्थक होना पाया जाता है। यहाँ सार्थकता का तात्पर्य अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था क्रम में उसकी निरंतरता का आशा-आकांक्षा सहित होने वाली उत्साह-आकांक्षा का अभिव्यक्ति-संप्रेषणा और प्रकाशन ही उत्सव के रूप में देखने को मिलता है। उत्सवों को प्रधानत: अखण्ड समाज के अर्थ में और सार्वभौम व्यवस्था के अर्थ में समारोह सम्पन्न होना एक आवश्यकता है।

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