न्याय-धर्म-सत्य दृष्टि का प्रयोग आवश्यक
मानवीय आचरण, उसकी सार्वभौमिकता के कार्य रूप को, सार्वभौम व्यवस्था के आधार पर ही देख पाना संभव हो पाता है, यही मुख्य मुद्दे की बात है। अभी तक यह मुद्दा अनुसंधान के गर्त में रहा है, अब इसके मानव सुलभ होने की संभावना बन चुकी है। ऐसी सार्वभौम व्यवस्था को अनुसंधान के उपरान्त ही सार्वभौम आचरण के परीक्षण के लिए, आपका ध्यान आकर्षित किया जा रहा है। सार्वभौम व्यवस्था को ऐसा समझा गया है कि मानव को परिवार मानव, ग्राम परिवार मानव, विश्व परिवार मानव के रूप में पहचाना जा सकता है। प्रधान बात यही है कि, परिवार में ही मानव की पहचान व प्रमाण होता है। परिवार कम से कम दो, या दो से अधिक व्यक्तियों के होते हैं। मूलत: विश्व परिवार ही अखण्ड समाज के रूप में ख्यात होता है। विश्व परिवार व्यवस्था ही परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था के रूप में प्रमाणित हो पाता है। अतएव मानव को परिवार में पहचानने के पहले मानव की परिभाषा आवश्यक हो जाती है, जिसके आधार पर ही अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था व्याख्यायित होती है। मानव की परिभाषा, मानव के यथास्थिति अध्ययन से ही प्रमाणित होती है जैसे- ''मनाकार को साकार करने वाला, मन:स्वस्थता (सुख) का आशावादी एवं प्रमाणित करने वाला मानव है।” हर मानव परिभाषा सहज व्याख्या के रूप में प्रमाणित होने के लिए स्वायत्त और मानवीयतापूर्ण आचरण संपन्न होना है। इस प्रकार से मनाकार को साकार करने को, प्रमाणों को सामान्य आकांक्षा अर्थात् आवास, आहार एवं अलंकार संबंधी वस्तुओं और उपकरणों तथा महत्वाकांक्षा अर्थात् दूरदर्शन, दूरश्रवण, दूरगमन संबंधी वस्तुओं और उपकरणों को साकार करने के रूप में देखा गया है। मन:स्वस्थता अर्थात् समाधानापेक्षा एवं प्रमाणित करने वाला का आशावादी होना, सहज होते हुए भी, परम्परा में प्रमाण के रूप में स्पष्ट नहीं हो पाया है। यद्यपि हर व्यक्ति सुख, शांति, संतोष और आनंद की अपेक्षा रखता ही है। यही मन:स्वस्थता का आशावादी होने का गवाही है।
मन:स्वस्थता मानव सहज जागृति का तृप्ति बिंदु है। मानव जब तक न्याय, धर्म, सत्य सहज दृष्टियों को प्रयोग करता नहीं है तब तक जागृति का प्रमाण सत्यापित कर नहीं पाता। जागृति से वंचित होने का मूल कारण अभी तक भ्रमित परंपराएँ और उस पर बनी हुई आस्थाएँ हैं। - भ.व. 177
''न्याय, धर्म, सत्य दृष्टियों का प्रयोग हर व्यक्ति कर सकता है।” यही जागृत परंपरा है। भ्रमित समुदाय परंपरा हर व्यक्ति को किसी न किसी सीमा में फँसा देती है। परिणामत: संकीर्णता में ग्रसित होना पाया जाता है। न्याय, धर्म, सत्य दृष्टियों का सहज ही विशाल, विशालतम होना पाया जाता है। - ज.व. 195-198
जागृतिपूर्ण मानसिकता अपने में मानवीयता, देव मानवीयता, दिव्य मानवीयता को प्रमाणित करने के क्रम में उद्यत रहती ही है। मानवीयता, देव मानवीयता, में परिवार और समाज व्यवस्था मानवीयता पूर्ण आचरण सहित प्रमाणित होना बनता है। इसी क्रम में दिव्य मानवीयता समग्र व्यवस्था में भागीदारी पूर्वक स्वतंत्रता, स्वराज्य को प्रमाणित करने में सार्थक हो जाती है। स्वतंत्रता, स्वराज्य सहअस्तित्व विधि से वैभवित होते हैं। स्वराज्य व्यवस्था में स्वाभाविक विधि से मानवीय शिक्षा-संस्कार, न्याय-सुरक्षा, उत्पादन-कार्य, विनिमय-कोष, स्वास्थ्य-संयम कार्य और व्यवस्था अपने आप में निर्वाह होते हैं। ऐसे स्वराज्य व्यवस्था परिवार मूलक विधि से विश्व परिवार व्यवस्था तक दश सोपानीय विधि से सार्थक हो जाते हैं। – ज.व. 144,145