है। दूसरी विधि से अस्तित्व सहज सह-अस्तित्व में परमाणु में विकास, गठनपूर्णता, जीवनी क्रम, जीवन का कार्यकलाप, जीवन जागृति क्रम, जीवन जागृति, क्रियापूर्णता उसकी निरंतरता और प्रामाणिकता (जागृति पूर्णता) उसकी निरंतरता दृष्टापद से है। इस प्रकार मानवीय शिक्षा का तथ्य अथ से इति तक समझ में आता है। इसी समझदारी के आधार पर हर मानव अपने में परीक्षण, निरीक्षण करने में समर्थ होता है। फलस्वरूप स्वायत्त परिवार व्यवस्था से विश्व परिवार व्यवस्था तक हम अच्छी तरह से सार्वभौमता, अक्षुण्णता को अनुभव कर सकते हैं। इस विधि से सेवा, व्यवस्था के अंगभूत कर्तव्य के रूप में, व्यवस्था दायित्व के रूप में, उत्पादन आवश्यकता, उपयोगिता, सदुपयोगिता के रूप में, परिवार व्यवहार सम्बन्ध, मूल्य, मूल्यांकन अर्पण, समर्पण और उभयतृप्ति के रूप में वर्तमान होना पाया जाता है। यह अधिकांश मानव में अपेक्षा भी है। - अ.श. 186–191

(*अर्थात्) मानवीयतापूर्ण शिक्षा अपने में सत्ता में संपृक्त प्रकृति नित्य वर्तमान और विकास क्रम विकास एवं जागृति क्रम जागृति सहज विधि से पदार्थ, प्राण, जीव और ज्ञानावस्थाओं का पूरकता, उपयोगिता, उदात्तीकरण का अध्ययन है। जिसके फलस्वरूप प्रत्येक मानव में स्वायत्तता, परिवार व्यवस्था में जीने की कला और समग्र व्यवस्था में भागीदारी स्वयं स्फूर्त होना स्पष्ट हुआ है। ये सभी तथ्य अस्तित्व में अनुभव होने का ही फलन है। - आ.व. 171

(b) शिक्षा-संस्कार परम्परा के मानवीयकरण से परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था सर्व-सुलभ होता है

सम्पूर्ण व्यवस्था परस्परता में ही वर्तमान और वैभव है। जैसे पदार्थावस्था अपने में सम्पूर्ण और व्यवस्था है, इनमें अनेक अंतर-प्रजातियाँ भी हैं। वह भी अपने-अपने स्वरूप में सम्पूर्ण और व्यवस्था है और समग्र व्यवस्था में भागीदारी निर्वाह करते हैं। ऐसे भौतिक पदार्थ ही अपने में समृद्घ होने के साक्ष्य में रासायनिक प्रवृत्तियों में दिखाई पड़ते हैं अर्थात् रासायनिक द्रव्यों के रूप में उदात्तीकृत होते हैं। फलस्वरूप प्राणावस्था की सम्पूर्ण रचनाएँ बीजानुषंगीय विधि से परंपरा के रूप में स्थापित हो जाते हैं। यह हर मानव को विदित है। पदार्थावस्था अपने विविधता को परिणाम के आधार पर तात्विक द्रव्यों के रूप में दिखाई पड़ते हैं। तीसरे स्थिति में जीवावस्था का शरीर रचना भी प्राण-कोषाओं में ही रचित-विरचित होते हैं। ऐसे रचनाक्रम वंशानुषंगीय विधि से वैभवित रहना दिखाई पड़ता है। जीवावस्था में समृद्घ मेधस युक्त शरीरों को जीवन संचालित करता है। समृद्घ मेधस पर्यन्त जितने भी रचनाएँ हैं वे सब स्वेदजों में गण्य हो जाते हैं। ये सब विरचित होकर हर सप्राणकोषा, निष्प्राण कोषा में परिवर्तित होकर बीज रूप में स्थित रहते हैं और यही निष्प्राण कोषा बीज, ऋतु-संयोग प्रणाली से सप्राणित हो जाते हैं। इस प्रकार स्वेदज संसार रचनाओं में हर प्राण कोषा ही निष्प्राण कोषा के रूप में बीज रूप में रह जाते हैं। यही रचनाएँ अण्डज में परिवर्तित होकर पिण्डज रचना तक रचना क्रम को विकसित करते हैं। इसी में सम्पूर्ण सप्त धातुओं का नियोजन संयोजन अनुपाती विधि से समाहित रहना पाया जाता है। सम्पूर्ण रसायन द्रव्य जो सप्त धातुओं के रूप में पहचाना जाता है ये सब मूलत: भौतिक वस्तु और परमाणु ही हैं क्योंकि परमाणु ही मूलत: व्यवस्था का आधार हैं।

सप्त धातुओं से रचित रचनाओं में समृद्घ मेधस और समृद्घिपूर्ण मेधस पर्यन्त रचना सम्बन्ध शरीर जो कर्मेन्द्रिय, ज्ञानेन्द्रिय उसके लिए आवश्यकीय अंग अवयव, आशय रसादितंत्र विधि सम्पन्न रचनाएँ गर्भाशय में सम्पन्न होता है।

Page 264 of 335