मानवीयतापूर्ण परंपरा का प्रमाण मानवीय शिक्षा-संस्कार सुलभता, न्याय-सुरक्षा सुलभता, विनिमय-कोष सुलभता, उत्पादन-कार्य सुलभता और स्वास्थ्य-संयम सुलभता ही है। इन्हीं पाँच आयामों के योगफल में संस्कृति, सभ्यता, विधि, व्यवस्था अपने-आप प्रमाणित होता है और अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था का स्वरूप और उसकी निरंतरता बना ही रहता है। - स.श. 266
(2) शिक्षा व्यवस्था
विकसित ही अविकसित को शिक्षा प्रदान करने में समर्थ है। शिक्षा का प्रयोजन है, सामाजिकता का विकास एवम् समृद्धि। ऐसी सामाजिकता मानवीयतापूर्ण तथा ऐसी समृद्धि समाधान के साथ होनी चाहिए। पूर्ववर्णित धर्मनैतिक तथा राज्य-नैतिक व्यवस्था के लिए – जो मानवीयतापूर्ण दृष्टि, स्वभाव तथा विषयों के प्रति मनुष्य में रूचि उत्पन्न कर सके तथा इस रूचि को व्यवहार में आचरित करने योग्य अवसर तथा साधन उपलब्ध करा सके, शिक्षा नीति है। - व्य.द. 1978, ch 16
“संस्कारारोपण प्रक्रिया की शिक्षा संज्ञा है”
(a) मानवीय शिक्षा का आधार:
मानवीय शिक्षा की पहचान
मानवीय शिक्षा प्रारूप के अनुसार मानव को मानवीयता के संयुक्त रूप में पहचानने की आवश्यकता है। जनाकांक्षा मानवीय शिक्षा का स्वागत करता है। जनचर्चा में इसे हृदयंगम करने और इसकी परिपूर्णता को साक्षात्कार करने की आवश्यकता है। परिपूर्णता का तात्पर्य समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी, भागीदारी सहित परिवार और विश्व परिवार व्यवस्था में भागीदारी को प्रमाणित करने के अर्थ में है।
शिक्षा की पहचान हर मानव के लिए आवश्यक है। हर देश काल में आवश्यक है। हर स्थिति परिस्थिति में आवश्यक है। इस आधार पर शिक्षा प्रारूप को जाँचने की आवश्यकता है। जांचने के उपरान्त स्वीकारने में सटीकता बन पाती है। इसे हर व्यक्ति परीक्षण, निरीक्षण कर सकता है। हर मानव में संज्ञानशीलता और संवेदनशीलता का प्रमाण प्रस्तुत होना आवश्यकता है क्योंकि संज्ञानशीलता पूर्वक ही व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी हो पाती है। ऐसी स्थिति में मानव का आचरण निश्चित, नियंत्रित हो पाता है। निश्चित होने के आधार पर सम्पूर्ण आचरण समाधान सम्पन्न रहना पाया जाता है। समाधान पूर्ण विधि से आचरण करने के क्रम में संवेदनाएँ नियंत्रित रहना देखा गया है। संवेदनाएँ नियंत्रित होना परस्परता में विश्वास का महत्वपूर्ण आधार है। - ज.व. 140–141