- प्रतीक मुद्रा के साथ ही अमानवीयता वश द्रोह-विद्रोह, शोषण, तस्करी की घटनाएं हो पाती हैं। प्रतीक वस्तु कोई धातु होना देखा गया प्रतीक मुद्रा, धातु मुद्रा और पत्र मुद्रा के रूप में देखा गया। यह दोनों प्रकार की मुद्रा प्रणाली में स्थिरता निश्चयता सिद्घ नहीं हो पाती इन सब कारणों से मानव कल्पित होना स्पष्ट हो जाता है। - ज.व. 262
विनिमय कार्य विधि की यह सही बेला है। मानव ने पहले भी एक बार विनिमय का प्रयास किया। उस प्रयास में उत्पादन कार्य के मूल्यांकन का आधार श्रम मूल्य नहीं रहा। उसके विपरीत लाभ मानसिकता उस समय में भी व्यापारी में बना रहा। लाभ मानसिकताएँ शोषण मूलक होते ही हैं। इसमें संग्रह-सुविधा का पुट रहता ही है। यह आज भी स्पष्टतया दिखाई पड़ता है। इस आधार पर मानव अपने व्यवस्था का अंगभूत अथवा समग्र व्यवस्था के अंगभूत रूप में अर्थ और आर्थिक गति को पहचानने की स्थिति में यह पता लगता है कि अस्तित्व में सम्पूर्ण विकास सहज सीढ़ियाँ आवर्तनशीलता और पूरकता विधि सम्पन्न है। - अ.श. 250
6.7 मानवीय संविधान का धारक-वाहकता
मानवीयतापूर्ण आचरण रूपी संविधान को पहचानना ही राष्ट्रीय मूल्य, चरित्र और नैतिकता का अथवा परिवार मूलक अखण्ड स्वराज्य व्यवस्था का आचार संहिता स्वाभाविक रूप में सर्वमानव के लिये बोधगम्य और व्यवहार गम्य होता है। - स.श. 122
मौलिक अधिकार का आधार भी मानवत्व ही है। यही स्वत्व, स्वतंत्रता, अधिकार रूपी मूल ऐश्वर्य है अथवा सम्पूर्ण ऐश्वर्य है। इसी ऐश्वर्य को वर्तमान में प्रमाणित करने के क्रम में ही स्वराज्य और स्वतंत्रता को परंपरा के रूप में प्रमाणित कर सकते हैं जिससे ही समाधान, समृद्घि, अभय, सह-अस्तित्व सर्वसुलभ होना नित्य समीचीन है। सर्ववांछा अथवा अपेक्षा अथवा आवश्यकता सर्वमानव में निहित है। - स.श. 150
मानवीय आचार संहिता रूपी मानसिकता यही है कि सर्वशुभ सर्वसुलभ हो। इसी क्रम में संविधान का प्रवेश रूप यह है कि सर्वमानव सहज सार्वभौम स्वतंत्रता, स्वराज्य व्यवस्था सहज आचरण को अभिव्यक्ति, संप्रेषणा व प्रकाशन सहित प्रत्येक मानव मूल्य व मूल्यांकन पूर्वक सम्पूर्ण आयाम, कोण, परिप्रेक्ष्य व दिशा में सभी देश काल में सुरक्षित, नियंत्रित, संतुष्ट, समृद्घ, समाधानित होने, रहने, करने, कराने, करने के लिये, मत देने के लिये यह न्याय संहिता मानव में, से, के लिये अर्पित है।
संविधान का लक्ष्य - 1. परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था (मानव धर्म) स्वानुशासन रूपी स्वतंत्रता है। 2. मानव धर्म समाधान सहज तृप्ति (सुख, शांति, संतोष, आनन्द और समाधान, समृद्घि, अभय, सह-अस्तित्व) और उसकी निरंतरता ही ‘‘स्वत्व’’ है। - स.श. 125