इतने दीर्घकालीन परिश्रम से अभी तक सर्वसुख का मूलरूप अथवा सार्वभौम रूप को पहचानने में भी अड़चन रहा है क्योंकि रहस्य के आधार पर, उपदेश के आधार पर, प्रयोगशालाओं में स्थापित शक्तिशाली सूक्ष्मदर्शी दूरदर्शी और जितने भी क्षारीय अम्लीय किरण-विकिरण संयोग पाकर कार्य करने वाले रस रसायनों के विश्लेषणों से भी सर्वसुख विधि निकल नहीं पायी। करोडों में, अरबों में एक व्यक्ति रहस्यवादी विचारधारा के आधार पर स्वान्त: सुख विधि को पा चुके हैं क्योंकि यह स्थली हमें देखने को मिला है। इससे भी सर्वशुभ होने का रास्ता, दिशा, सूत्र, व्याख्या, अध्ययन विधि, प्रक्रिया परम्परा गम्य नहीं हो पायी। यह भी इसके साथ समीक्षित हुई, कोई भी व्यक्ति स्वान्त: सुख को प्राप्त करने के बाद भी विभिन्न समुदायों के परस्परता में निहित द्रोह-विद्रोह, शोषण, युद्घ समाप्त नहीं हो पाया है। इतना ही नहीं हर समुदाय में निहित अन्तर्विरोध की शांति नहीं हो पायी। विज्ञानवाद युद्घोन्मुखी-संघर्षोन्मुखी होने के आधार पर इस शताब्दी के अंत तक सर्वाधिक प्रभावित रहा देखने को मिल रहा है। यही विगत का समीक्षा है। संघर्ष-युद्घ समाधान अथवा सर्वशुभ का आधार नहीं हो पाया।- आ.व. 216-217
भौतिकवादी विधि से मानव सुविधा-संग्रह के चक्कर में पड़कर व्यक्तिवादी हो गया, दूसरा आदर्शवादी विधि से भक्ति-विरक्ति में समर्पित होकर व्यक्तिवादी हो गया। दोनों विधि से परिवार, समाज, व्यवस्था और व्यवहार का तालमेल स्वरूप निष्पन्न नहीं हो पाई। इसलिए आगे शेाध करने के लिए प्रयत्न किये। शोध से यही स्पष्ट हुआ मानव समझदार हो सकते हैं इसके लिए अध्ययन विधि ही पर्याप्त है।
अध्ययन विधि से जो स्वीकृतियाँ हुई रहती हैं बोध रूप में उसे प्रमाणित करने की प्रवृत्ति स्वयं स्फूर्त होती है। फलस्वरूप हर मानव जागृत हो जाता है। जागृत होने के प्रमाण में ही स्वभाव गति प्रतिष्ठा मानवत्व सहित व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी प्रमाणित हो जाती है। इस विधि से मानवीय संस्कृति सभ्यता विधि व्यवस्था में ज्ञान विज्ञान विवेक का संगीतीकरण होना प्रमाणित होता है।
प्रस्तावित मध्यस्थ दर्शन सहअस्तित्ववाद से जागृति पूर्वक जीना सहज हो जाता है। इसलिए परिवार व्यवस्था में जीना बन जाता है इसकी आवश्यकता हर मानव को स्वीकार है ही। इसलिए यह एक आवश्यकता है। अखण्ड समाज में भागीदारी-समझदारी पूर्वक सम्पन्न होना स्वीकार होता है।
मूल्यांकन पूर्वक ही हर मानव आगे के कार्यक्रम को सुनिश्चित करता है। सार्थक बिन्दुएँ वर्तमान में स्पष्ट होते हैं। निरर्थक बिन्दुएँ समीक्षित होकर विगत हो जाते हैं। जो विगत हो गये वे सब वर्तमान में जो परिपूर्णता के रूप में प्रमाणित होना होता है उसमें विलय हो जाते हैं। जैसे सम्पूर्ण गलतियाँ समाधान में विलय होते हैं। इसी प्रकार से सार्थकता में असार्थकता विलय हो जाते हैं। यही समीक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका है। - ज.व. 140
इस धरती की हालत वैज्ञानिक युग के अनन्तर जैसे बन पड़ी है और पर्यावरण संतुलन जैसा जर्जर छिन्न-भिन्न होता जा रहा है, उनके पहले भी किए गए, सोचे गए परिणामों के फलस्वरूप अनेकानेक नस्ल, रंग, जाति, धर्म, मत, संप्रदाय, देश, भाषा, वर्गों के रूप में बांटकर अनेक अहमता की दीवालें बन चुकी हैं। पूर्ववर्ती विधि से बनी हुई तमाम समुदायों में बंटी हुई मानव जाति सह-अस्तित्व, अभय, समृद्घि और समाधान सम्पन्न होना संभव नहीं है। विकल्पात्मक अखंड सार्वभौम और अक्षुण्ण समाज व्यवस्था और जागृति सहज विधि से सम्पन्न होने के लिए विकल्पात्मक समाज-रचना विधि-व्यवस्था कार्यविधि, व्यावहारिक योजना विधि। इसके लिए विकल्पात्मक जीने की कला विधि, विकल्पात्मक