विचार विधि, विकल्पात्मक दर्शन विधियों को जानना, मानना, पहचानना, निर्वाह करना अनिवार्य है। - अ.श. 61–62
7.2 मध्यस्थ दर्शन - आधार बिंदु
अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन बनाम मध्यस्थ दर्शन के द्वारा निर्धारण करने के कुछ आधार बिंदुओ को प्रस्तुत किया है।
अस्तित्व में, से, के लिए “स्थिति सत्य”, “वस्तु स्थिति सत्य” तथा “वस्तुगत सत्य” ही न्याय, समाधान, सत्य का अध्ययन है। “स्थिति सत्य” सम्पूर्ण अस्तित्व ही है। अस्तित्व स्वयं सत्ता में संपृक्त प्रकृति है। प्रकृति, अस्तित्व में, विभक्त अर्थात् एक-एक रूप में दिखाई पड़ती है। और अस्तित्व में सत्तामयता कितनी लम्बाई चौड़ाई में फैली है, यह मानव में, से, के लिए, एक आवश्यकता के रूप में, प्रस्तुत नहीं हो पाता। दूसरी विधि से, यह कितना लम्बा चौड़ा है इसको मानव नाप नहीं सकता। इसके साथ यह भी देखने को मिला है कि “मानव, आवश्यकता सहित सम्पूर्ण प्रकार के प्रर्वतन में आरुढ़ होता है।” अतएव सत्तामयता सहज, लम्बाई चौड़ाई का नाप नहीं हो पाने के कारण ही इसे व्यापक कहा गया है। - म.वि. 138–140
साथ में सत्तामयता सर्वत्र सर्वदा एक ही स्वरूप में विद्यमान वर्तमान होने के कारण इसे व्यापक कहना, सार्थक सिद्ध होता है। ऐसी व्यापक सत्ता में, अनंत प्रकृति सहज इकाइयाँ अर्थात् विभक्त इकाइयाँ होना देखा जाता है। विभक्त होने का तात्पर्य, एक एक के रूप में अंगुली न्यास करने = (देखने, दिखाने) के अर्थ में सार्थक है। खूबी यही है कि सत्ता में ही सम्पूर्ण इकाइयाँ डूबी हुई, भीगी हुई, घिरी हुई होना, पाया जाता है। ऐसी सत्तामयता को शून्य, ज्ञान, परमात्मा आदि नामों से भी इंगित कराया जाता है। सत्तामयता का तात्पर्य है, सम्पूर्ण प्रकृति का, अपनी अपनी अवस्था में, कार्य करने के लिए ऊर्जा सम्पन्न रहना। - म.वि. 7
(B) अस्तित्व में परमाणु का विकास, जीवन
अस्तित्व स्थिर, विकास निश्चित है।
अस्तित्व में स्थिति-गति अविभाज्य हैं। बल, स्थिति में और शक्ति, गति में है।
- सत्ता में संपृक्त अर्थात् ऊर्जा में संपृक्त अनंत इकाई रूपी प्रकृति, अस्तित्व सर्वस्व है। सम्पूर्ण प्रकृति के जड़ और चैतन्य, ये दो भाग हैं।
- चैतन्य प्रकृति में मनुष्य व मनुष्येतर जीव हैं।
- जड़-प्रकृति में पदार्थावस्था व प्राणावस्था हैं।