इसी आधार पर जीव संसार को जीने की आशा के आधार पर जीवनी क्रम में जीता हुआ पहचाना गया है। हर जीव में जीने की आशा का होना हर मानव को बोध होता ही है। यद्यपि जीवों में जीवन, जीने की आशा को ही प्रमाणित कर पाया है। इसके मूल में यह भी पहचान में आया है कि शरीर को जीवन मानते हुए जीते हैं। इसलिए स्वस्थता के आधार पर अनुकूलता प्रतिकूलता को पहचाना करता है। यही जीव संसार का शरीर को जीवन मानने का प्रमाण है। - ज.व. 46

शरीर द्वारा जीवावस्था आशापूर्वक भोगों में व्यस्त रहता है, जो प्रत्यक्ष है।

समृद्ध मेधस युक्त रचना के उपरान्त ही (अथवा समृद्ध मेधस युक्त शरीर को) जीवन, सहज ही जीवन्तता प्रदान करता है। जीवंतता प्रदान करने की प्रक्रिया यह है कि जीवन अपने जीने की आशा सहज प्रभाव से, मेधस को प्रभावित करता है। मेधस के द्वारा ज्ञानवाही विधि से, सम्पूर्ण शरीर में जीवंतता का प्रभाव क्षेत्र बना ही रहता है। मेधस पर जीवन का, संकेतों के रूप में जो प्रभाव प्रभावित रहता है, वही सर्वाधिक पांचों ज्ञानेन्द्रियों द्वारा, कार्यशील प्रवर्तनशील देखने को मिलता है। - म.वि. 212

जीवावस्था में अस्तित्व पुष्टि सहित आशा धर्म विद्यमान होना देखा गया है। इसलिये सम्पूर्ण जीवावस्था जीवनीक्रम सहित परिणाम, पुष्टि सहित जीने की आशा सहज लक्ष्य रूप में होना पाया जाता है। इसलिये जीवावस्था में जीने की आशा, लक्ष्य, सूत्र और व्याख्या प्रमाणित है। - स.श. 264

(E) जीवन में जागृति क्रम

“मानव जीवन जागृति क्रम में अमानवीयता से मानवीयता एवं मानवीयता से अतिमानवीयता की ओर है”। - अ.द. 104

मानव शरीर रचना में ही ‘समृद्ध पूर्ण’ मेधस रचना पाई जाती है। जीवावस्था और ज्ञानावस्था का अंतर इतना ही है कि जीवावस्था में शरीर रचना विधि के अनुसार (वंशानुषंगीयता) जीवन अपने को प्रकाशित करने में बाध्य है। जबकि ज्ञानावस्था के मानव में यह देखने को मिलता है कि कल्पनाशीलता, कर्मस्वतंत्रता विधि से कर्म करते समय स्वतंत्र और फल भोगते समय परतंत्र विधि से न्याय का अपेक्षा, सही कार्य व्यवहार करने की इच्छा, सत्यवक्ता के रूप में शरीर यात्रा आरंभ काल से देखने को मिलता है। - स.श. 96

सहअस्तित्ववादी नजरिये से मानव जीवन और शरीर के संयुक्त रुप होने का अध्ययन सम्पन्न करते हुए, जीवन चैतन्य पद प्रतिष्ठा होने की स्थिति समझ में आता है। चैतन्य प्रकृति रुपी जीवन जागृतिक्रम से जागृति पूर्वक, मानव परम्परा में जागृति को प्रमाणित करना होता है। मानव परम्परा में शरीर और जीवन का सान्निध्य आवश्यक है, अथवा सहअस्तित्व आवश्यक है। जीवन में होने वाली दस क्रियाओं के आधार पर जैसा अनुभव, प्रमाण, अनुभव का बोध और संकल्प, संकल्प का साक्षात्कार एवं चित्रण, चित्रण का तुलन और विश्लेषण, विश्लेषण का आस्वादन और चयन, ये दस क्रियायें जीवन में सम्पादित होती हैं। यही दस क्रियायें जीवन जागृति के अनन्तर प्रमाणित होते हैं। शरीर को जीवन मानते तक, जीवन क्रियाओं में से साढ़े चार क्रियायें ही सम्पन्न हो पाते हैं। शेष साढ़े पाँच क्रियायें प्रमाणित नहीं हो पाते। इसी संकट वश मानव प्रताड़ित होता है। स्वयं में अन्तर्विरोध वश, जीवन शक्तियाँ प्रमाणित नहीं हो पाने

Page 30 of 335
26 27 28 29 30 31 32 33 34