गणितीय भाषा से अधिक गुणात्मक भाषाओं से परस्पर मानव में इंगित होना देखा गया है और गुणात्मक भाषा से तथा गणितात्मक भाषा से जितना इंगित हुआ है उससे अधिक और सम्पूर्णता कारणात्मक भाषा से इंगित होना पाया गया है। इंगित होने का तात्पर्य, प्रयोजन सहित वस्तु स्वरूप सर्वस्व को जानना-मानना और पहचानने से है इसलिए मानव भाषा कारण-गुण-गणितात्मक है।
रूप सहज अस्तित्व में, से आंशिक भाग आँखों से इंगित होता है। गणित के द्वारा सम्पूर्ण रूप और आंशिक गुण इंगित होता है, गुण का तात्पर्य प्रभाव सहित गति है। सम्पूर्ण गुण और स्वभाव गुणात्मक भाषा से इंगित होता है। कारणात्मक भाषा विधि से स्वभाव-धर्म इंगित होता है और ‘अस्तित्व समग्र’ इंगित होता है। इस विधि से मानव भाषा अपने आप सुस्पष्ट है।
इससे यह पता चलता है कि प्रकृति ही जड़- चैतन्य स्वरूप में है तथा जड़ प्रकृति ही चैतन्य प्रकृति में संक्रमित होता है। -आ.व. 140-142
सम्बंधित परिभाषाएं
गठनपूर्णता
- परमाणु में मध्यांश व परिवेशिय अंशों का निश्चित संख्यात्मक विधि संतुष्ट होना प्रस्थान-विस्थापन से मुक्त होना। - प.स. 64
- गठन पूर्णता के अर्थ में, परमाणु में अंशों की संख्या में परिवर्तन के साथ मात्रात्मक परिवर्तन, फलस्वरूप गुणात्मक परिवर्तन। परिवर्तन का अंतिम परिणाम अथवा संक्रमण गठन पूर्णता। यही परिणाम का अमरत्व है। - प.स. 62
परमाणु में विकास पूर्ण (गठनपूर्ण) होने के बाद अणुबंधन व भारबंधन से मुक्त हो जाते हैं। यही चैतन्य परमाणु जीवन पद में प्रतिष्ठित रहना पाया जाता है। ऐसे चैतन्य इकाई भार और अणुबन्धन से मुक्ति पाकर आशा बंधन से अपने कार्य गतिपथ सहित पुंजाकार रूप में प्रतिष्ठित होना, ऐसे पुंजाकार का एक आकार होना, ऐसे आकार के एक शरीर रचना (पिण्डज या अण्डज विधि से) रचित रहना अस्तित्व सहज कार्यक्रम है। यह 'जीवन' अपनी महिमा को जीवनी क्रम में संपूर्ण जीवों के रूप में दिखता है। इसी कार्यक्रम के गति क्रम में मानव शरीर रचना भी एक स्वाभाविक क्रिया है। - आ.व. 178
जीवों के शरीर में जब समृद्ध मेधस की रचना होती है (या हो जाती है) उस स्थिति में ऐसे शरीर को जीवन संचालित करता है। ऐसे शरीर में ही सप्त धातुओं के क्रियाकलाप, एक दूसरे के तालमेल के सहित संपन्न हुआ देखने को मिलता है। सप्त धातुए हैं- 1. रस, 2. मांस, 3. मज्जा, 4. रक्त, 5. स्नायु, 6. हड्डी और 7. वसा। इन धातुओं के रचना क्रम में एक दूसरे को तालमेल वाली संयोजना भी देखने को मिलती है। मूत्र तंत्र, गर्भ तंत्र, मल तंत्र, पाचन तंत्र, रस तंत्र, रक्त तंत्र, हृदय तंत्र, फुस्फस तंत्र, मेधस तंत्र, ये सब नाड़ियों, नसों, स्नोतसों ??, पेशियों से गुंथा हुआ दिखाई पड़ता