है। इसी से पूरा शरीर तंत्र स्पष्ट होता है। इसमें जीवंतता सबसे पहली शर्त है। जीवंतता सहित ही जीव शरीर और मानव शरीर का संचालन जीवन से हो पाता है। मानव शरीर अथवा जीव शरीर के साथ जीवन, काम करने के लिए पहली शर्त समृद्ध मेधस का रहना है। और कौन सा ऐसा पहचानने का बिंदु है जहाँ से जीवन और शरीर का संयोग होना संभव हो जाता है। इसमें इसे भी एक ध्रुव बिंदु के रूप में परावर्ती (शरीर में मेधस तंत्र द्वारा जीवन के संकेतों को ग्रहण करने और जीवन संकेत भेजने का) कार्य संपादित होते रहती है। ऐसे सभी शरीर जीवन संयोग से चलने फिरने योग्य हो पाते हैं। जिन शरीरों में जीवन के संयोग से ही पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ कार्य कर पाती हैं, ऐसे शरीर में समृद्ध मेधस का होना पहचाना जा सकता है। इसके अलावा बाकी सभी प्रकार की रचनाएँ स्वेदज होना स्पष्ट हैं।
इससे यह पता चला कि प्रत्येक ऐसा शरीर जिसमें समृद्ध मेधस की रचना हो चुकी है और विभिन्न रस संयोग विधि से ही रक्त के रूप में परिवर्तित होता है, ऐसा तंत्र शरीर में रचित हो चुका है। ऐसे शरीर में ही मांस-मज्जा आदि वस्तुएँ देखने में आता है। ऐसे ही शरीर को जीवन संचालित कर आशा को जीव शरीरों में ही प्रमाणित करता है, जबकि मानव शरीर में आशा, विचार, इच्छा, संकल्प और प्रामाणिकता को प्रमाणित करता है, इसीलिए जीवन की अभिव्यक्ति के लिए हर जीव परंपरा में उन-उन शरीरों का होना एक सहज प्रक्रिया है। - भ.व. 214
जीवावस्था की शरीर रचना प्राण कोशिका समूह से निर्मित होती है। इस रचना में मेधस एक विशिष्ट भाग समाहित रहता है जिसे प्राणावस्था में नहीं पाया जाता है। अ.द.
जीवावस्था में समृद्ध मेधस युक्त शरीरों को जीवन संचालित करता है। समृद्ध मेधस पर्यन्त जितने भी रचनाएँ हैं वे सब स्वेदजों में गण्य हो जाते हैं। ये सब विरचित होकर हर सप्राणकोषा, निष्प्राण कोषा में परिवर्तित होकर बीज रूप में स्थित रहते हैं और यही निष्प्राण कोषा बीज, ऋतु-संयोग प्रणाली से सप्राणित हो जाते हैं। - स.श. 177
स्वेदज संसार भौतिक वस्तु और रासायनिक द्रव्य सहज, संयोग होता है। इनका आचरण न तो भौतिक वस्तुओं जैसा होता है, और न समृद्ध मेधस सम्पन्न शरीर रचना और जीवन के संयुक्त रूप में होने वाले आचरण जैसा। इसीलिए इसका नाम स्वेदज प्रकृति दिया गया है। इन्हीं रचनाओं में से मेधस प्रणाली का आरंभ होना पाया जाता है। यही क्रम से, समृद्धि की ओर गतिशील रहता है। क्योंकि समृद्ध मेधस सम्पन्न शरीर रचना, इसी धरती में साक्षित हो चुकी है। इसके सामान्य लक्षण रस, मांस, मज्जा, हड्डी, नस, रक्त, चर्म संपन्न शरीर रचना में समृद्ध मेधस का वैभव जीवावस्था में वंशानुषंगीयता के रूप में, प्रमाणित है और मानव संस्कारानुषंगीयता के रूप में प्रमाणित होता है। वंशानुषंगीयता में जीवन, शरीरों के अनुरूप कार्य-कलाप में संलग्न हो जाता है, फलतः वंशानुषंगीय अभिव्यक्ति में जीवन का वैभव सम्बद्ध हो जाता है।- म.वि. 18
जीवावस्था, समृद्ध मेधस युक्त शरीर और जीवन का संयुक्त साकार रूप होते हुए भी जीवन, शरीर को तादात्म्य विधि से स्वीकारा रहता है। इसका सूत्र है - जीवन, शरीर को जीवन्त बनाये रखते हुए शरीर को ही अपना जीने की स्थली स्वरुप स्वीकारता है। इसलिए जीवन शक्तियाँ उन-उन शरीर रचना के अनुरुप बह बन पाती है। इसी यथार्थता के आधार पर अनेकानेक प्रजाति के जीवों का वर्तमान होना स्पष्ट है। ये सब वर्तमान में ही हैं। प्रत्येक प्रजाति के जीव अपने ढंग से, अपनी परंपरा को बनाये रखते हुए देखने को मिलता है।