प्रत्येक जीव का आचरण अपने-अपने शरीर सहज रूप में व्याख्यायित रहता है। ऐसी व्याख्या के आधार पर ही प्रत्येक प्रजाति के जीव अपनी मौलिकता की व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी के अर्थ में सार्थक बनते हुए देखने को मिलता है। प्रत्येक अंग-अवयवों का अपना-अपना आकार वंश की प्रधान पहचान है। इस पहचान के साथ उसका कार्य जीवन के संयोग से ही संपन्न होता हुआ समझ में आता है। जीवन, जीव शरीरों में, आशा का प्रसारण करता हुआ देखने को मिलता है। प्रत्येक जीव जीने की आशा से ही जीता हुआ मिलता है। ज्ञानावस्था सहज मानव जीवन में आशा, विचार, इच्छा, ऋतम्भरा और प्रमाण जैसे शक्तियों का क्रियाकलाप समझने को मिलता है। इसे समझने वाला भी मानव ही है।

मानव शरीर भी अवयवों के संतुलित रूप में ही प्रकाशित है। इस प्रकार प्राण कोषाओं से सभी वनस्पतियाँ जीव और मानव शरीर की रचनाएँ होते हुए समझ में आती हैं। जीवन और शरीर के संयुक्त रूप में जीने वाले जीव एवम्‌ मानव शरीर में सप्त धातुएँ देखने को मिलती हैं। सप्त धातुओं की सर्वोच्च संतुलित रचना मानव शरीर ही है। स्वेदज व असमृद्ध मेधस युक्त रचनाओं को जीवन चलाता नहीं है अथवा वे चलाने योग्य नहीं होते। उनमें सप्त धातुएँ देखने को नहीं मिलती हैं। वे रचनाएँ प्राण कोषाओं से ही रचित रहती हैं। झाड़ व पौधे सभी प्राण कोषाओं की ही रचना होते हुए इनमें सप्त धातु नहीं होते। इन्हीं सब प्रमाणों के साथ जीवन और शरीर का संयोग उसी शरीर से संयोजित हो पाता है, जिस शरीर की संरचना में सप्त धातुएँ अंग अवयवों के संतुलन के अर्थ से रचित रहते हैं तथा समृद्ध मेधस व समृद्धिपूर्ण मेधस की रचना संपन्न होती है। ऐसे ही शरीर को जीवन संचालित करता हुआ देखने को मिलता है।

जीवावस्था की शरीर रचनाएँ वंशानुगत विधि से सफलता का प्रकाशन करती हैं। वंशों की महत्वपूर्ण भूमिका आकारों और ज्ञानेन्द्रियों- कर्मेन्द्रिय कार्यों के आधार पर निश्चित होना पाया जाता है। आकार, आयतन कार्य के तालमेल के लिए उस-उसके अंग-अवयवों की रचना निश्चित अनुपाती होना पाया जाता है। इनका कार्य संतुलन, जीवन सहज आशा, मेधस क्रिया के आधार पर संपन्न होना पाया जाता है। प्रत्येक जीव का आचरण अपने-अपने शरीर सहज रूप में व्याख्यायित रहता है। ऐसी व्याख्या के आधार पर ही प्रत्येक प्रजाति के जीव अपनी मौलिकता की व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी के अर्थ में सार्थक बनते हुए देखने को मिलता है।

प्रत्येक अंग-अवयवों का अपना-अपना आकार वंश की प्रधान पहचान है। इस पहचान के साथ उसका कार्य जीवन के संयोग से ही संपन्न होता हुआ समझ में आता है। जीवन, जीव शरीरों में, आशा का प्रसारण करता हुआ देखने को मिलता है। प्रत्येक जीव जीने की आशा से ही जीता हुआ मिलता है। ज्ञानावस्था सहज मानव जीवन में आशा, विचार, इच्छा, ऋतम्भरा और प्रमाण जैसे शक्तियों का क्रियाकलाप समझने को मिलता है। इसे समझने वाला भी मानव ही है।

जीवों का कार्यकलाप उन के प्रजाति वंश के अनुसार निश्चित कार्य रूप में रहता है। यही संतुलन का तात्पर्य है। मानव अस्तित्व में दृष्टा पद में होते हुए भी अभी तक मानव का कार्यकलाप अनिश्चित है। मानव शरीर भी अवयवों के संतुलित रूप में ही प्रकाशित है। इस प्रकार प्राण कोषाओं से सभी वनस्पतियाँ जीव और मानव शरीर की रचनाएँ होते हुए समझ में आती हैं। - भ.व. 296-298

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