असत्य को सत्य से, अभिमान को सरलता से, भय को अभय से, आलस्य को चेष्टा से, असफलता को पराक्रम व पुनः प्रयोग से, रोग को औषधि-आहार एवं विहार से, समाधान एवं परिहार करने की व्यवस्था है जो मानव के लिये एक अवसर है। यही आवश्यकता है।

समस्त कर्मों से मानव ने सत्य में प्रतिष्ठा, धर्म में आरूढ़ता, न्याय में निरन्तरता एवं वस्तु की उपयोगिता का अनुभव करने की कामना एवं प्रयास किया है। दुष्चरित्र में लिप्त जीवन का भय-त्रस्त होना विवशता है, जो स्व-पर पीड़ा का प्रधान कारण है। यही मानव में नीहित अमानवीयता का भय है। यही असामाजिकता एवं असहअस्तित्व का मूल रूप है।

अधिक जागृत, कम जागृत का दर्शन; कम जागृत, अधिक जागृत को पहचानता है।

सम, विषम, मध्यस्थ शक्तियाँ क्रम से रजोगुण, तमोगुण एवं सत्वगुण हैं। कर्म फलवती है। भ्रमित मानव फल भोगते समय में परतंत्र है। इसी सार्वभौमिक नियमवश ही मानव कर्म और उसकी फलतवत्ता के प्रति निर्श्रम होने के लिए बाध्य है।

- क.द. ५-३२

(ii) उपासना

(*पुस्तक से मात्र झलक दिया है)

मानव जीवन में उपासना एक महत्वपूर्ण भाग है। उपासना ही मूल प्रवृत्तियों का परिमार्जन एवं परिवर्तन प्रक्रिया है। यही अध्ययन संस्कार एवं स्वभाव परिवर्तन भी है। उपायपूर्वक सहवास पाना ही उपासना सहज अवधारणा है जिसके लिये परिश्रम (परिमार्जित श्रम) एवं अभ्यास है।

उपासनायें कूटस्थ, रूपस्थ एवं आत्मस्थ भेद से होती हैं।

'विषय-चतुष्टय’ के लिये अधिभौतिक तत्वों में, ‘ऐषणा-त्रय’ के लिये अधिदैविक (सामाजिक एवं व्यावहारिक) मूल्यों में, दिव्य मानव अध्यात्म में तादात्म्य पाया जाता है जिसके लिये ही क्रम से आसक्ति, उपासना एवं निष्ठा प्रयुक्त होती है। समस्त उपासनाओं के मूल में लक्ष्य साम्य है वह अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था है।

सार्वभौमिक मानवीयतापूर्ण पद्धति से ‘नियम-त्रय’ (बौद्धिक, सामाजिक एवं प्राकृतिक) के आचरणपूर्वक ही आर्थिक एवं साम्प्रदायिक वर्ग-भावनाओं से मुक्त होने की संभावना एवं मुक्ति है। इसी में समस्त वर्ग-भावना विलीन हो जाती है। इसलिये उपासना अभीष्ट समझदारी जागृति पूर्वक सार्थक होता है जो जागरण ही है।

मानव में शक्तियाँ क्रिया; इच्छा एवं ज्ञान शक्ति ही है, जो उनकी अर्हताएं हैं। शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्धेन्द्रियों द्वारा शक्तियों का अपव्यय न होना, साथ ही सद्व्यय होना ही क्रिया शक्ति की जागृति है। सद्व्यय एवं अपव्यय का निर्धारण

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