अध्ययन ये ही मूल अभ्यास है। क्योंकि अध्ययन विधि से ही, शोध विधि से ही अवधारणा का स्वीकृत होना देखा जाता है। अन्य विधि जैसे उपदेश विधि में भ्रमित होने की संभावना सदा बना ही रहता है।
हर परंपरा में अपने ढंग की आदेश प्रतिष्ठा स्थापित रहता ही है। वह अध्यवसायिक (अध्ययनगम्य) होते तक उपदेश या सूचना मात्र है। परंपरा में जिस आशय के लिये आदेश-निर्देश है वह तर्क संगत-व्यवहार संगत बोध होने की प्रक्रिया प्रणाली पद्घति ही अध्ययन कहलाती है। तर्क का सार्थक स्वरूप विज्ञान सम्मत विवेक और विवेक सम्मत विज्ञान होना देखा गया। प्रयोजन विहीन उपदेश प्रयोग वह भी व्यवहार, प्रमाण विहीन उपदेश तब तक ही रह पाता है जब तक तर्क संगत न हो। तर्क का तात्पर्य भी इसी तथ्य को उद्घाटित करता है। तृप्ति के लिये आकर्षण प्रणाली (भाषा प्रणाली) ऐसे तर्क सहज रूप में ही विज्ञान के आशित विश्लेषणों को विवेक से आशित प्रयोजनों का प्रमाणित होना सहज है। हम इस बात को समझ चुके हैं कि प्रयोजनपूर्वक जीने के लिये, प्रमाणित होने के लिये समाधान समृद्घि के रूप में सह-अस्तित्व दर्शन के लिये तर्क संगत अध्यवसायिक विधि का होना आवश्यक है।
अध्ययन क्रियाकलाप, तर्कसंगत प्रयोजन, प्रयोजन संगत मानवापेक्षा, मानवापेक्षा संगत जीवनापेक्षा, जीवनापेक्षा संगत सह-अस्तित्व, सह-अस्तित्व संगत विकास क्रम और विकास, विकासक्रम और विकास संगत जीवन-जीवनी क्रम-जागृति क्रम-जागृति एवं इसकी निरंतरता सह-अस्तित्व सहज लक्ष्य है। अस्तित्व सहज लक्ष्य में भी मानव ही अविभाज्य है और दृष्टा है। इसलिये मानव अस्तित्व सहज सह-अस्तित्व विधि से पूरकता-उदात्तीकरण, पूरकता-विकास, पूरकता-जागृति सूत्रों के आधार पर सह-अस्तित्व सहज अध्ययन सुलभ हुआ है। - आ.व. 221
मानव ‘है’ का अध्ययन करता है। अध्ययन का तात्पर्य अनुभव के प्रकाश में स्मरण पूर्वक अर्थात् शब्दों का स्मरण पूर्वक, अर्थों से इंगित वस्तुओं का, अस्तित्व में पहचान पाना है। इस प्रकार शब्दों का स्मरण, शब्दों के अर्थ से इंगित वस्तुएं अस्तित्व में सुपष्ट होना ही जागृति है। सुस्पष्टता का तात्पर्य स्वयं में अनुभव, कार्य-व्यवहार में प्रमाण होना ही है। - भ.व. 49,51
मानव ही अस्तित्व में ध्वनि, शब्द, नाद, भाषा व वस्तु सहज प्रभेदों को जानता, मानता, पहचानता है अथवा इसके योग्य है। जैसे-पदार्थ अवस्था में पाई जाने वाली, व्यवस्था का मूल रूप परमाणु में भी ध्वनि और वस्तु को पहचानता है।
फलत: अणुओं के रूप में होना स्वाभाविक है। प्राणकोषाओं में ध्वनि व कार्य संकेतों को परस्पर कोषाएं पहचानते हैं फलस्वरूप रचनाएं संपन्न होती हैं। उसी भांति जीवों में भी, शब्द, ध्वनि और नाद उनके परस्पर पहचान में होना पाया जाता है। मनुष्य में शब्द, ध्वनि, नाद व भाषा ये सहज ही परस्पर वस्तुओं को इंगित करने के अर्थ में जानने, मानने, पहचानने को मिलता है। भाषा का तात्पर्य होता है, जिससे वस्तु सहज सत्य भास हो जाय। मानव भाषा में सत्य भास, आभास, प्रतीति सहित अनुभव होने के अर्थ में ही प्रयोग किया जाता है। यही जागृति सहज सम्प्रेष्णा है। इसी क्रम में भाषा के प्रति विश्वास हो पाता है। मनुष्येतर प्रकृति में भी अपने अपने 'त्व' सहित व्यवस्था को प्रमाणित करने के