क्रम में सम्पूर्ण ध्वनि, नाद व शब्द को देखा जाता है। जागृत मनुष्य परस्पर भाषा द्वारा इंगित होना चाहता है या इंगित कराना चाहता है। – म.वि. 187-188
मानव भाषा कारण गुण गणित के अविभाज्य रूप में है। जिससे ही परम सत्य रूपी सह-अस्तित्व भासाभास पूर्वक प्रतीति सहज बोध, सार्थक होना पाया गया। फलत: अनुभव होना सिद्घ हुआ। - ज.व. 183-185
पुस्तक मात्र सूचना है। मानव ही इसे समझता है, समझाता है।
मानव परंपरा जागृत होने के लिये अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित विश्व दृष्टिकोण को तर्क संगत विधि से अध्ययनगम्य होने के प्रणालियों से अभिव्यक्त होने के फलन में मानव परंपरा जागृत होना स्वाभाविक है। इसका प्रमाणों का धारक-वाहक अध्यापक ही होना पाया जाता है। (*कल्पनाशीलता के लिए) निर्देशिका के रूप में वाङ्मय और धारक-वाहकता के रूप में अध्यापक ही हो पाते हैं। विद्यार्थियों को जागृत शिक्षा प्रदान करने में समर्थ होना स्वाभाविक है। इस क्रम में मानव परंपरा जागृत होने का संयोग समीचीन है। जागृति निरंतर, न्याय, समाधान, सत्य सहज होता ही है, इसका वैभव ही मानवापेक्षा और जीवनापेक्षा के रूप में सार्थक हो जाता है। ऐसे सार्थकता को प्रमाणित करना ही जागृत मानव परम्परा का तात्पर्य है।- आ.व. 254
(i) कर्म
(*पुस्तक से मात्र झलक दिया है)
जीवन का कार्यक्रम ही कर्म है। यही आचरण है। समस्त कर्म तीन भागों में ज्ञातव्य है. ..सुकर्म, दुष्कर्म एवं मिश्रित कर्म
सम्पूर्ण कर्मों का फल चार रूपों में ज्ञातव्य है. ..मोक्ष, धर्म, काम एवं अर्थ। मानव में इच्छाएँ तीव्र, कारण एवं सूक्ष्म भेद से ज्ञातव्य है।
मानव के द्वारा प्रकट होने वाला ज्ञान तीन प्रकार से ज्ञातव्य है :- (1) भौतिक (2) बौद्धिक एवं (3) आध्यात्मिक
प्रधानत: समस्त बहिरंग साधनों से पदार्थ विज्ञान की साधना तथा अन्तरंग साधनों से बौद्धिक एवं अध्यात्म विज्ञान की साधना है।
समस्त कर्मों के फलस्वरूप ही अर्थ, अनर्थ, सुकाम, दुष्कर्म, धर्म, अधर्म तथा मोक्ष-बंधन है।
समस्त इच्छाओं के सात भेद हैं :-