मोक्ष के लिए अर्थ, अर्थ के लिए मोक्ष जो क्रमशः उत्तमोत्तम अधमाधम है। धर्म के लिए अर्थ, अर्थ के लिए धर्म जो क्रमशः मध्योत्तम अधम है। काम के लिए अर्थ, अर्थ के लिए काम जो क्रमशः उत्तम अधम मध्यम है एवं अर्थ के लिए अर्थ जो मध्यम है।

तीन प्रकार की अन्वेषण प्रवृत्तियाँ मानव में पाई जाती हैं :- (1) सत्यान्वेषण, (2) ऐषणान्वेषण, (3) विषयान्वेषण।

स्वार्थपूर्ण व्यवहार अधम और असामाजिक, परार्थ पूर्ण व्यवहार मध्योत्तम और सामाजिक, परमार्थ पूर्ण व्यवहार उत्तम, सामाजिक एवं स्वतंत्र है। परमार्थ पूर्ण व्यवहार ही सर्वशुभ मानसिकता है।

लक्ष्य मूलक, मूल्य मूलक व रूचि मूलक प्रवृत्तियाँ होना पाया जाता है। सामाजिक संतुलन स्वधन, स्वनारी/स्वपुरूष एवं दया पूर्ण कार्य व्यवहार परंपरा है। इसके विपरीत में पर नारी, परपुरूष, पर-धन एवं पर-पीड़ा से असंतुलन ही है, जो प्रत्यक्ष है।

आवश्यकीय मूल प्रवृत्तियाँ क्रम से असंग्रह (समृद्धि), स्नेह, विद्या, सरलता एवं अभय (वर्तमान में विश्वास) के रूप में, अनावश्यकीय मूल प्रवृत्तियाँ सुविधा, संग्रह, द्वेष, अविद्या, अभिमान एवं भय के रूप में प्रत्यक्ष हैं।

प्राकृतिक संतुलन, सामाजिक संतुलन एवं बौद्धिक संतुलन योग्य नियम ही आवश्यकीय नियम है। यही नियम-त्रय है। प्रियाप्रिय, हिताहित, लाभालाभ दृष्टियाँ भौतिक व्यवसाय तथा उसके उपयोग में प्रयुक्त हुई हैं जो जीव चेतना पूर्वक जीते हुए मानव में है। न्‍यायान्याय, धर्माधर्म, सत्यासत्य दृष्टियाँ जागृत मानव परंपरा में व्यवहार तथा आचरण में निर्णायक सिद्ध हुई हैं।

सद्शास्त्राध्ययन के बिना सत्य कामना एवं प्रवृत्ति, सत्य कामना के बिना सत्य- प्रेम, सत्य-प्रेम के बिना सत्य-निष्ठा, सत्य-निष्ठा के बिना सत्य-प्रतिष्ठा, सत्य-प्रतिष्ठा के बिना सत्य-प्रतीति, सत्य-प्रतीति के बिना सत्यानुभव, सत्यानुभव के बिना सद्‌ शास्त्र का उद्घाटन तथा सद शास्त्र के उद्घाटन के बिना सद्‌ शास्त्र का अध्ययन पूर्ण और सार्थक नहीं है।

सद्‌ शास्त्र सेवन, मनन एवं आचरण से व्यक्ति तथा परिवार में शान्ति तथा स्थिरता पाई जाती है।

इस वर्तमान में मानव चार प्रकार से गण्य है।

(1) पुण्यात्मा, (2) पापात्मा, (3) सुखी, (4) दुखी।

तीन प्रकार के कर्म-फलों को पाने के लिये ही मानव आद्यान्त कार्य करता है। स्वार्थ, परार्थ, परमार्थ के लक्ष्य भेद से सम्पूर्ण कर्म सम्पन्न होते हैं। मानव जीवन के आद्यान्त कार्यक्रम एवं आचार तीन प्रकार से गण्य है- (1) सत्याचार, (2) लोकाचार और (3) विषयाचार। ये क्रम से उत्तम, मध्यम एवं अधम की परिगणना में है।

पतनोन्मुखी जीवन की श्रृंखला में अपराध के तीन कारण दृष्टव्य है :- (1) अभाव (2) अत्याशा एवं (3) अज्ञान। इसके साथ ही राग, द्वेष, असत्य, अभिमान, भय, आलस्य, रोग और असफलता भी है। इनका निराकरण क्रम से अभाव को उत्पादन एवं अभ्यास से, अत्याशा को विवेक से, अज्ञान को ज्ञान से, राग को विराग से, द्वेष को स्नेह से,

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