मानवीयता की सीमा में नियम-त्रय के रूप में है। अंतः:करण मूल प्रवृत्तियों अर्थात् आशा, विचार, इच्छा व ऋतम्भरा का अपव्यय न होना मानव चेतना, अति मानव चेतना विधि पूर्वक ही है और यही सद्व्यय है। यही इच्छा शक्ति का जागरण है। सम्यक-बोध एवं अनुभूति पूर्णता ही ज्ञान प्रकटन क्षमता है। यही ज्ञानशक्ति का जागरण अथवा पूर्ण जागरण है। यह ‘जागृति-त्रय’ मानवीयता एवं अतिमानवीयता में प्रत्यक्ष है।
विवेक व विज्ञान ही परोक्ष ज्ञान (सद्व्यवहारिक ज्ञान) का प्रधान लक्षण है। अनुभव ही परोक्ष ज्ञान की अन्तिम स्थिति है। परोक्ष ज्ञान के बिना नित्यानित्य, युक्तायुक्त, न्यायान्याय, धर्माधर्म, सत्यासत्य,इष्टानिष्ट, दृष्टादृष्ट तथा परोक्ष ज्ञानाधिकार सिद्ध नहीं होता है।
सत्य बोलने का अभ्यास करने से भय व अविश्वास की निवृत्ति, हर्ष तथा उत्साह का उदय होता है। अहिंसा पर अधिकार पा लेने से विरोध से भय मुक्ति और स्नेह व उदारता का उदय होता है। कृत, कारित, अनुमोदित, कायिक, वाचिक, मानसिक भेदों से हिंसा में भागीदारी न करना = अहिंसा।
अपरिग्रह में निष्ठा से दयनीयता तथा हीनता का नाश एवं धैर्य व धृति उदारता का उदय होता है। अस्तेय प्रतिष्ठा से धूर्तता व विकलता का नाश तथा तुष्टि व संतोष का उदय होता है। अस्तेय का तात्पर्य चोरी न करना है। विश्व के प्रति मूल्य (भाव) की प्रतिष्ठा से इष्ट और साधक के मध्य विषमता का अभाव होता है। साथ ही तत देवता का स्वभाव प्रवेश होता है। शब्द के अर्थ अर्थात् मन्त्रार्थ का तदरूपतापूर्वक स्मरण करने के अभ्यास से उसका अर्थ एवं स्वभाव गम्य होता है। सभी सार्थक शब्द मन्त्र है।
अधिक जागृत में समर्पण से अभिमान व अहंकार का उन्मूलन तथा विद्या व सरलता का उदय होता है। शरीर संवेदना संयत रहने से मन की पवित्रता, मन की पवित्रता से मनोबल का लाभ होता है।
स्व-शरीर मोह नष्ट होने से संसार के प्रति मोह दूर होता है। जिस लक्ष्य में अन्त:करण (मन, वृत्ति, चित्त, बुद्धि) को तदाकार करें उसी में वह प्रखर होता है। पर गुण गणना अभ्यास से स्वदुर्गुणों का नाश होता है। पक्षपात बुद्धि पर-पक्ष के सद्गुणों को ग्रहण करने में असमर्थ होती है क्योंकि वह ईर्ष्या, द्वेष, घृणा, उपेक्षा और भ्रम से मुक्त नहीं है।
उपासना के लिये वातावरण का महत्व अपरिहार्य है, जिसमें से मानव कृत वातावरण ही प्रधान है, जो शिक्षा व व्यवस्था के रूप में ही है। मानव के बौद्धिक क्षेत्र में पायी जाने वाली अनावश्यक कल्पनाओं का निराकरण ही दर्शन-क्षमता में गुणात्मक परिमार्जन है। यही गुणात्मक संस्कार-परिवर्तन, शिक्षा एवं जीवन के कार्यक्रम का योगफल है।
ऐषणासक्त बौद्धिक व्यवस्था में मानवीय तथा देव मानवीय स्वभाव प्रकट होता है। उसी के अनुरूप में मानसिक वातावरण की स्थितिशीलता है। ऐसी क्षमता ही सामाजिक चेतना ही सजगता एवं सतर्कता से परिपूर्ण होना पाया जाता है। विषयासक्त प्रवृत्ति व प्रक्रिया में अमानवीय आचरण होता है जो पाशविकता तथा दानवीयता के रूप में दृष्टव्य है। इनमें उसी के योग्य मानसिकता पाई जाती है। यही लुप्त-सुप्त कल्पना का कारण है। यही अजागृति तथा अपूर्ण सतर्कता का द्योतक है।