अध्ययन करने के उपरान्त पता चला कि संक्रमण, जीवन, जीवन जागृतिक्रम, जागृतिपूर्णता तथा उसकी निरंतरता पूर्वक मानव परम्परा नित्य वैभवशील होना समझा गया अभी तक जागृति क्रम में स्थित जीवन और रासायनिक भौतिक रचना सहज शरीर के संयुक्त रूप में प्रत्येक मनुष्य है। इन तथ्यों के आधार पर मानव के “ज्ञानावस्था की इकाई’’ का पहचान सहित नाम दिया गया है।
अस्तित्व में “परमाणु का विकास’’ देखने को मिलता है। प्रत्येक परमाणु में गठन, प्रत्येक गठन में एक से अधिक अंशों को देखा जाता है। अथवा समझा जाता है। इस प्रकार गठन का अर्थ, परमाणु में कार्यरत अंशों को पहचान सहित इंगित करने के अर्थ में स्पष्ट है। परमाणु गठन में कम से कम दो अंशों का होना प्रमाणित है। इससे यह पता लगता है कि गठित होने का उपक्रम प्रवृत्ति अंशों में ही होना समाहित रहता है। इससे प्रत्येक अंश-गठन में, स्वभाव गति सम्पन्न होने का आशय समाहित है और एक अंश, दूसरे अंश से निश्चित दूरी को बनाए रखते हुए, कार्यरत रहना समझ में आता है। इससे यह भी अर्थ स्पष्ट होता है कि एक अंश, दूसरे अंश की निश्चित दूरी को, पहचानते हुए कार्य करते हैं।
प्रत्येक गठन गतिपथ सहित, कार्यशील रहना पाया जाता है। गति पथ कम से कम एक होना, भी एक अनिवार्य स्थिति है, यह समझ में आता है। इसी गतिपथ को परिवेश भी कहा गया है। इसी क्रम में एक परिवेश से आरंभ होकर परमाणु में एक से अधिक परिवेशों को देखा गया है। इस विधि से अंशों का अधिक कम होना भी परमाणु में विकास-क्रम में देखा गया। इस प्रकार परमाणु में विकास का आधार (1)अंशों का गठन (2) गतिपथ (3) अंशों का प्रस्थापन (अंशों का गठन में समाहित होना) विस्थापन (अंशों की संख्या घटना-बढ़ना) ज्ञात हुए। ऐसे विकास क्रम में, गठन पूर्ण पद में संक्रमित होना पाया जाता है। पाये जाने का तात्पर्य, अस्तित्व में होने से मानव सहज समझ से है। ऐसे गठन पूर्ण परमाणु ही जीवन के रूप में वैभवित होते हैं - ऐसा पाया जाता है।
विकास-क्रम में जितने भी परमाणु होते हैं, ये सब अपने ही स्वभाव गति में प्रकाशित होते हैं। फलस्वरूप उन उन का मौलिक आचरण स्पष्ट है। मौलिकता का तात्पर्य, उन उन के आचरण का निश्चित पहचान बनाए रखने से है - जैसे दो अंशों से गठित परमाणु, अपने अपने आचरण में मौलिक होते हैं। ऐसे परमाणुओं को, भौतिक परमाणुओं के नाम से जाना जाता है। ऐसे परमाणु भौतिक रूप में होते ही हैं। भौतिकता का प्रमाण, परमाणुओं में भारबन्धन और अणुबंधन के रूप में प्रमाणित है। ऐसे बंधन के आधार पर ही, अनेक परमाणुओं से रचित अणु और अनेक अणुओं से रचित पिण्ड देखने को मिलते हैं।
ऐसी भौतिक वस्तुएं, अपने में समृद्घ होने के उपरान्त ही रासायनिक क्रियाकलाप में, भागीदारी का निर्वाह करते हुए दिखाई पड़ती हैं। रासायनिक क्रिया का तात्पर्य, विभिन्न भौतिक अणु, निश्चित अनुपात से मिलकर, अपने अपने आचरणों को त्याग कर तीसरे प्रकार के आचरण के लिए तत्पर होने से है। जैसे - पानी, अम्ल और क्षार के रूप में देखने को मिलता है। ऐसे रासायनिक द्रव्यों का ऊष्मा के दबाव सहित, प्राण कोषाओं के रूप में उदात्तीकृत होना, सह-अस्तित्व सहज क्रिया है। उदात्तीकरण होने का तात्पर्य प्राण कोषा और उनसे रचित रचनाओं से है। रासायनिक, भौतिक रचनाओं में विरचित होने की संभावना बनी ही रहती है। इस प्रकार उदात्तीकरण का निश्चित स्वरूप और प्रयोजन स्पष्ट होता है।