2.2 प्रकृति सहज चार अवस्था; रूप, गुण, स्वभाव, धर्म
“प्रत्येक इकाई में रूप, गुण, स्वभाव व धर्म अविभाज्य है”
प्रकृति सहज चार अवस्थाएँ (परस्पर पूरक)
अवस्था | रूप = आकार आयतन घन | क्रिया | स्वभाव | धर्म | अनुषंगी (प्रवृत्ति) |
पदार्थावस्था | मिट्टी, धातु मणि, पत्थर | रचना-विरचना | संगठन-विघटन | अस्तित्व | परिणामानुषंगी प्रवृत्ति |
प्राणावस्था | पेड़-पौधे लता, गुल्म | श्वसन-प्रश्वसन | सारक-मारक | अस्तित्व सहित पुष्टि | बीजानुषंगी प्रवृत्ति |
जीवावस्था | पशु-पक्षी | वंश केन्द्रित | क्रूर-अक्रूर | अस्तित्व, पुष्टि सहित जीने की आशा | वंशानुषंगी प्रवृत्ति |
ज्ञानावस्था | मनुष्य | समझदारी केन्द्रित आहार, विहार कार्य-व्यवहार | धीरता, वीरता, उदारता, दया, कृपा, करुणा | अस्तित्व, पुष्टि जीने की आशा सहित सुख | संस्कारानुषंगी (समझदारी के अनुसार प्रवृत्ति) |
मात्रा मूल स्वरूप में, एक व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी करता हुआ, इकाई के रूप में पहचाना जाता है। ऐसा यह एक से अधिक अंशों के गठन के रूप में आरम्भ होता है, जिसका आकार (परिणाम) निश्चित होता है। आकार (परिणाम) के निश्चितता के पक्ष में बहुत सारा उदाहरण प्रस्तुत हो चुका है। अब यहाँ रूप, गुण, स्वभाव, धर्म के प्रति स्पष्ट होना आवश्यक है। हर रूप आकार, आयतन, घन के रूप में स्पष्ट है। आकार का मतलब जैसा बना हुआ रहता है, साथ में जितने जगह में फैला रहता है, कार्य करता है अर्थात् स्थिति रहता है। जैसा एक परमाणु के बारे में सोचा जाये, कितने जगह में क्रियाशील रहता है। वैसे ही आगे अनेक अणु से बनी रचनाएं चाहे बहुत बड़ी हों, छोटी हों, इनका रूप जिस आकार में बने रहते हैं, जितना जगह घेरे रहते हैं, इसके आधार पर रूप का पहचान होता है। इसमें से आकार क्या है, आकार कैसे है का पक्ष बनावट से है, आयतन का अर्थ घिराव (फैलाव) से है। घेरने का तात्पर्य