उदात्तीकरण पूर्वक ही मानव शरीर भी एक रासायनिक रचना है और चैतन्य पद में संक्रमित परमाणु ही जीवन है - यह अस्तित्व सहज है। इस जीवन और शरीर के संयुक्त रूप में मानव का होना और मानव परम्परा का होना पाया जाता है। जीवन ही भ्रम पूर्वक जागृति क्रम में दुःख एवं समस्याओं को भोगता है। जीवन ही ज्ञान पूर्वक जागृत होता है, फलस्वरूप सुख एवं समाधान को प्रमाणित करता है।– म.वि. 7-13
सम्बधित परिभाषाएं
क्रियापूर्णता
- क्रिया पूर्णता के अर्थ में गंतव्य क्रम में गुणात्मक परिवर्तन अर्थात् अमानवीयता से मानवीयता और मानवीयता से सतर्कता जो परिष्कृत संचेतना अर्थात् अतिमानवीयता का प्रकाशन और प्रतिष्ठा
- जागृति सहज सर्वतोमुखी समाधान, सतर्कता, मानवीयतापूर्ण क्रियाकलाप।
आचरणपूर्णता
- आचरण पूर्णता के गंतव्य क्रम में श्रेष्ठ और श्रेष्ठठतम गुणात्मक परिवर्तन, परिमार्जन जिसका प्रमाण सजगता जो परिष्कृति पूर्ण संचेतना का प्रकाशन और प्रतिष्ठा है। - प.स. 62, 66
- दिव्य मानव प्रतिष्ठा-दिव्य मानवीयता। जीवन मुक्त, सजगता, सहजता, केवल्य, गन्तव्य, विकास का चरमोत्कर्ष।
जागृति क्रम
- भ्रान्त ज्ञानावस्था से भ्रान्ताभ्रान्त ज्ञानावस्था, भ्रान्ताभ्रान्त ज्ञानावस्था से निर्भ्रांत ज्ञानावस्था का विकास।
- गणितवाद से गुणवाद, गुणवाद से कारणवाद, कारणवाद से जागृतिवाद। प.स. 74
- जीवन जागृति क्रम - अमानवीयता से मानवीयता, मानव से देव मानव, देव मानव से दिव्य मानवीयता की ओर गति। - प.स. 78
जागृति
- ज्ञान विवेक विज्ञान संपन्नता ज्ञान अर्थात् जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन ज्ञान, मानवीयतापूर्ण आचरण ज्ञान की संयुक्त अभिव्यक्ति, जीवन लक्ष्य
- मानव लक्ष्य को विवेचना सहित पहचानना।
- क्रियापूर्णता, सतर्कता, भ्रम से मुक्त जीवन, विकास परम सहज प्रकाशन। - प.स. 74
जीवन जागृति
गति का गंतव्य, भ्रम मुक्ति, परम विकास, आचरण पूर्णता उसकी निरंतरता। - प.स. (1993), 38