- <strong>आकार, आयतन, घन के अर्थ में रूप।</strong>
2. गुण
- <strong>सम, विषम, मध्यस्थ के अर्थ में गुण (शक्तियाँ)।</strong>
- <strong>गुण :- </strong>
- <strong>सापेक्ष शक्तियां। </strong>
- <strong>सम-विषम - मध्यस्थ गतियाँ। विषम गुण = आवेशित गति। समगुण = स्वभाव गति। मध्यस्थ गुण = व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी रूपी गति (स्वभाव गति की निरंतरता)। </strong>
- <strong>स्वभाव गति अथवा अपेक्षित गति का प्रकाशन। </strong>
3. स्वभाव
- <strong>रचना, रचना की परंपरा, विरचना के रूप में स्वभाव (मौलिकता)।</strong>
- <strong>गुणों की उपयोगिता ही स्वभाव है। मौलिकता की स्वभाव संज्ञा है ।</strong>
4. धर्म
- <strong>जिससे जिसका विलगीकरण संभव नहीं है, वह उसका धर्म है </strong>
- <strong>अस्तित्व, पुष्टि, आशा और अनुभूति सुख, शांति, संतोष, आनंद सहज अर्थ में धर्म है। - प.स.</strong>
प्रत्येक एक में ‘जिसका जो अर्थ है का स्वरूप’, रूप, गुण, स्वभाव के रूप में व्याख्यायित होना पाया जाता है। इन चारों आयामों की अविभाज्यता में प्रत्येक एक व्यवस्था के रूप में मूल्यांकित होता है और प्रत्येक एक क्रिया के रूप में ही मिलता है।
पदार्थावस्था में आकार आयतन घन के रूप में रूप, समविषम मध्यस्थ क्रिया-कलाप के रूप में गुण, संगठन-विघटन के रूप में स्वभाव, अस्तित्व सहज रूप में धर्म स्पष्ट है। पूर्णता को इंगित करने कराने के अर्थ में प्रयोग किया गया भाषा एवं परिभाषा है।
- <strong>प्राणावस्था में आकार आयतन घन के रूप में रूप सम-विषम मध्यस्थ के रूप में गुण, सारक-मारक के रूप में स्वभाव और अस्तित्व सहज पुष्टि रूप में धर्म होना समझ में आता है। </strong>
- <strong>जीवावस्था में आकार आयतन घन रूप, सम विषम मध्यस्थ गुण, क्रूर-अक्रूर स्वभाव, और अस्तित्व पुष्टि सहित आशा के रूप में धर्म पहचानने में आता है। </strong>
- <strong>ज्ञानावस्था में मानव आकार आयतन घन के रूप में रूप, सम विषम मध्यस्थ के रूप में गुण; धीरता, वीरता, उदारता, दया, कृपा, करुणा, स्वभाव; अस्तित्व पुष्टि, आशा सुख के रूप में धर्म समझ में आता है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि स्वभाव धर्म ही प्रत्येक अवस्था की मौलिक पहचान है और क्रम</strong>