प्रक्रिया के रूप में इकाई अथवा रचना में किसी एक ध्रुव बिंदु के आधार पर, अनेक कोणों में निकाला जाता है। ऐसे प्रत्येक कोण, किसी एक दिशा सूचक, दूसरी विधि से, किसी एक की नैसर्गिकता में (अर्थात् किसी एक के सभी ओर जो इकाईयां हैं वह सब) उन उनके कोणों से, दिशा के रूप में वांछित इकाई की स्थिति की दिशा को स्पष्ट कर देता है। इस प्रकार दिशा परस्पर देश, उसमें भी परस्पर वस्तु के आधार पर स्पष्ट हुई है। काल के सम्बन्ध में - “क्रिया की अवधि = काल”। जबकि क्रिया की निरंतरता रहती ही है।
किसी एक निश्चित क्रिया की अवधि को पहचानने के उपरान्त काल की गणना की जाती है। काल का ज्ञान, क्रिया के आधार पर होते हुए क्रिया की निरंतरता को भूलने के आधार पर अथवा भूलाने के आधार पर (अथवा न जानने के फलस्वरूप) काल के सम्बन्ध में अनिश्चितता बनी रहती है। यह भी मानव के भ्रमित रहने का साक्षी है। काल की अभिव्यक्ति, क्रिया करती है। प्रत्येक रचना व इकाईयां क्रियाशील हैं। अस्तु यह तीनों देश, काल, दिशा की संयुक्त अभिव्यक्ति वस्तु- स्थिति सत्य के रूप में स्पष्ट है। इस प्रकार वस्तु स्थिति सत्य की अभिव्यक्ति, मानव परम्परा में, अनुभव मूलक विधि से प्रमाण है। इसी प्रकार स्थिति सत्य, वस्तु गत सत्य, अनुभव मूलक प्रणाली से प्रमाणित होता है। - म.वि. 175-176
(F) भौतिक क्रिया, रासायनिक क्रिया, जीवन क्रिया
अस्तित्व में प्रत्येक “एक’’ का प्रभाव क्षेत्र उससे अधिक होता है। जैसे एक परमाणु जितना भी अपनी लम्बाई, चौड़ाई व ऊंचाई सहित है उससे अधिक क्षेत्र में वह कार्य प्रभाव रहते हुए देखने को मिलता है क्योंकि एक दूसरे के बीच में रिक्त स्थली रहता है। यह इस बात का प्रमाण है कि परमाणु में अपना प्रभाव क्षेत्र परमाणु में निहित अथवा कार्यरत सम्पूर्ण अंशों का जितना घन होता है, उससे अधिक अवकाश में, अपना कार्य प्रभाव क्षेत्र बनाए रखता है। इसी का दूसरा प्रमाण, परमाणु में निहित प्रत्येक अंश, परस्पर एक निश्चित दूरी में रहते हुए, निश्चित व्यवस्था को व्यक्त करते हैं। ऐसे परमाणुओं से भौतिक और रासायनिक अणु और रचनाएं देखने को मिलती हैं। परमाणु विकसित होकर गठन पूर्ण होता है। चैतन्य इकाई ही जीवन पद है। ऐसे जीवन ही जागृति पूर्वक क्रिया पूर्णता, आचरण पूर्णता को विश्राम और प्रामाणिकता के रूप में प्रभावित करते हैं। यही परमाणु विकास और जागृति वैभव है। अर्थात् जीवन का मूल रूप भी गठन पूर्ण परमाणु है। इन सब घटनाओं महिमाओं का दृष्टा जीवन ही है। जीवन का अद्भुत वैभव, उसी का कार्य क्षेत्र और प्रभाव क्षेत्र है। चैतन्य प्रकृति रूपी जीवन, अक्षय बल व अक्षय शक्ति सम्पन्न होने के कारण आशा, विचार, इच्छा, संकल्प व प्रामाणिकता के रूप में, अपने प्रभाव क्षेत्र को बनाए रखना हर व्यक्ति में प्रमाणित है।
यह तथ्य स्पष्ट हो चुका है कि अस्तित्व में भौतिक, रासायनिक और जीवन क्रिया ही सम्पूर्ण क्रिया का मूल रूप है। इनमें से भौतिक क्रियाकलाप के मूल में परमाणुओं का कार्यरत रहना, रासायनिक क्रियाकलाप के मूल में परमाणु का कार्यरत रहना और जीवन क्रियाकलाप में भी मूलत: गठन पूर्ण परमाणु का होना स्पष्ट है, यह स्पष्ट क्रियाकलाप बच्चे, युवा, बूढ़े सभी को समझ में आता है। परमाणु भले सबको समझ में आये या न आये, भौतिक क्रियाकलाप अलग, रासायनिक क्रियाकलाप अलग, जीवन क्रियाकलाप अलग स्पष्ट हो जाता है। यद्यपि इन सब क्रियाकलाप