मानव में जिह्वा (जीभ) से, हर प्रकार की रूचियों को पहचानता है। नाक से गंध को, सुगन्ध-दुर्गन्ध भेद से, स्पर्श से कठोर-मृदु के भेद से, पहचानना होता है। कानों से भी कठोर - मृदु भाषा को, आंखों से रूप-कुरूप को पहचाना जाता है। आंख, कान, नाक, जिह्वा, स्पर्श से प्राप्त संयोग से, ऊपर वर्णित नामों से इंगित अर्थ प्रत्येक जीवन्त मानव में होना, पाया जाता है।
शरीर रचना, रासायनिक द्रव्यों से रचित रचना है। शरीर रचना कार्य विधिवत अर्थात् वंशानुषंगीय रूप में गर्भाशय में संपन्न होना पाया जाता है। मानव शरीर भी वंशानुषंगीय विधि से रचना पूर्वक स्पष्ट है, जिसका विरचना होना भी स्पष्ट है। इस प्रकार जीवों का शरीर, वनस्पतियों की रचनाएं अस्तित्व सहज रूप में सम्पन्न हुई हैं। यहां मानव से सम्मिलित अध्ययन है। सम्पूर्ण प्राण कोषाएं स्पंदनशील रहती हैं। प्रत्येक कोषा अपने अनुकूल रसायन रसग्राही और विरल (वायु) द्रव्यग्राही होती है। इस सामान्य स्पष्टता से यह सर्वविदित होता है कि शरीर के सम्पूर्ण अंग अवयव विशेषकर रसायन रचना हैं। ऐसी प्राण कोषाएं अस्तित्व में, पूरकता उदात्तीकरण विधि से, सह-अस्तित्व सहज रूप में स्पष्ट हैं।
ज्ञानेन्द्रियों एवं कर्मेन्द्रियों की रचनाएं एक संयुक्त अभिव्यक्ति हैं। इसी क्रम में जिह्वा एक रासायनिक रचना है। उसके संयोग में जो द्रव्य समीचीन होता है वह रासायनिक, भौतिक ही हो पाता है। ऐसे संयोग में जिह्वा के साथ, जीवन्तता वर्तमान रहती है या जब तक जीवन्तता रहती है तब तक शब्द, स्पर्श आदि ज्ञानेन्द्रियों व हाथ, पैर आदि कर्मेन्द्रियों से ऊपर कहे सभी परिणामों का नाम दिया जाना, मानव सहज कार्य है। अस्तु जीवन, जिह्वा के संयोग से आई हुई घटना के परिणामों का नाम है - खट्टा, मीठा, खारा, कडुवा, कसैला, तीखा, मानव परम्परा में प्रचलित है। यह एक सहज घटना है कि जीवन्त जिह्वा संयोग में आया हुआ द्रव्योद्देयी परिणाम होते हैं। इसी प्रकार कान में शब्दों का संयोग, दो प्रकार के परिणाम का भाषाकरण है। वह है कठोर शब्द और सार्थक शब्द।
नाक के संयोग में आए हुए द्रव्यों का पहचान सुगन्ध, दुर्गंध रूप में है। स्पर्श के संयोग से आया हुआ द्रव्य, वस्तुओं का दो परिणाम पहचाना गया है जो मृदु और कठोर रूप में है। चक्षु से भी रूपों का, प्रतिबिंब संयोग होता हुआ सुरुप-कुरूप में वर्णन होता है। ज्ञानेंद्रियों के कार्यों की स्वीकृति है।
पहले कहे अनुसार, सभी इंद्रियों का जागृत जीवन कार्य का अर्थ, समझदारी के रूप में स्पष्ट होता है। समझदारी जागृत जीवन स्वत्व है। शरीर तंत्र सहित सभी अंग अवयवों में, समझदारी का स्थान नहीं है, जबकि प्रत्येक मानव में समझदारी से ही सभी कार्य-व्यवहार विन्यास सार्थक होता है।
मानव में जागृति सहज समझदारी का प्रमाण, जानने-मानने का तृप्ति बिंदु है। प्रत्येक मानव जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन व मानवीयतापूर्ण आचरण सहज समझ पर विश्वास करता है। अन्यथा अपनी समझ पर विश्वास नहीं करता है। सम्मिलित रूप में अंग-अवयव परस्परता सहित रचना-विरचना क्रम में सम्पूर्ण भौतिक रासायनिक इकाईयां कार्यरत तथा वर्तमान हैं। मानव शरीर, अन्य जीवों का शरीर और वनस्पतियां इसी धरती के रासायनिक-भौतिक वैभव के रूप में हैं, जिनमें रचना, विरचना कार्य संपन्न होता है। – म.वि. 108–109