यह सह-अस्तित्व में स्वीकृति है। इस संदर्भ में पहले ही स्पष्ट किया जा चुका है कि संपूर्ण वनस्पति रचनाओं का सभी जीवों और मानवों के लिए आहार आदि विधि से पूरक रहना पाया जाता है। वही विरचना की स्थिति में पदार्थावस्था के लिए पूरक होना पाया जाता है।
जीवों में भी यह देखने को मिलता है कि अधिकतर वंशानुषंगीय परंपरा निश्चित कार्य-व्यवहार विहार करता है- यह स्पष्ट हो चुका है। इन सब का शरीर और जीवन के संयुक्त रूप में होना पाया जाता है। शरीर ही अनेक रचनाओं का स्वरूप है। इन रचनाओं में जीव जाति पर्यन्त, प्राणावस्था और पदार्थावस्था के लिए पूरक होना पाया जाता है। सभी वन्य प्राणी जीवित अवस्था में वनस्पतियों के लिए अर्थात् प्राणावस्था के लिए पूरक हैं यह देखने को मिलता है। जीव जानवरों की श्वसन क्रिया से, मलमूत्र से बहुत सारी वनस्पतियों का रोग दूर होता है। शरीर जब विरचित हो जाता है, तब वह खाद गोबर होता ही है। इस प्रकार तीनों अवस्थाओं की परस्पर पूरकता को मानव देखता है। मानव इन तीनों अवस्थाओं के लिए पूरक है, यह स्वीकारता है। इसकी आवश्यकता को अनुभव करता है तब पूरकता की कसौटी में ठीक उतरता है। मानव अभी तक कसौटी में ठीक उतरा नहीं है। अभी भी इसकी (मानव का अन्य अवस्थाओं के लिए) पूरक होने की प्रतीक्षा है। इस विधि से जो तथ्य इंगित होता है, वह यह है कि जागृत विधि से मानव भी अन्य प्रकृति अर्थात् जीवावस्था, प्राणावस्था, पदार्थावस्था के लिए और मानव (मानव) के लिए पूरक है। यह अस्तित्व सहज सत्य है, पर परम्पराओं को भ्रम रहा एवं स्वयं उसकी अजागृतिवश मानव के लिए पूरक होने के जितने भी अवसर और आवश्यकताएँ हैं, उतनी पूरकता को मानव प्रमाणित नहीं कर पाया। अब तक कोई कोई लोग मानव कुल के लिए किसी भी अंश में, किन्हीं भी आयामों में पूरक हुए हों ऐसे लोगों का यहाँ आज भी गीत गाया जाता है। – भ.व. 122
उक्त विश्लेषण पूरकता विधि से भौतिक-रासायनिक क्रिया-प्रक्रियाएँ, परमाणु में अंशों का परिवर्तन, परस्पर अणुओं के पूरक विधि से रासायनिक द्रव्यों की महिमा सम्पन्न कार्यकलाप अनेक रचनाएँ, प्रत्येक रचना अपने वातावरण सहित सम्पूर्ण इसी क्रम में यह धरती भी एक रचना, ग्रह-गोल आदि भी एक रचना है। यह धरती भी अपने वातावरण सहित सम्पूर्ण है। इस धरती का पूरकता परस्पर ग्रह-गोल, सौर-व्यूह, अनेक सौर-व्यूह, अनेक सौर-व्यूहों के समूह रूपी आकाशगंगा परस्परता में पूरकता विधि से कार्य करता हुआ देखने को मिलता है। यही व्यवस्था के रूप में कार्य करने का गवाही है। सौर-व्यूह में हर ग्रह-गोल परस्परता में निश्चित दूरी के साथ ही तालमेल बनाया हुआ दिखाई पड़ते हैं। ऐसे तालमेल ही व्यवस्था का स्वरूप हैं। क्योंकि ऐसे तालमेल विधि से पूरकता, उदात्तीकरण, विकास इसी धरती पर देखने को मिलता है। - आ.व. 210
प्रकृति – रूप, गुण, स्वभाव, धर्म का अविभाज्य वर्तमान। जड़ और चैतन्य, चार अवस्था व चार पदों में स्पष्ट।- प.स.
1. रूप