साक्ष्य के आधार पर स्पष्ट होता है। गठनपूर्णता का महिमावश ही चैतन्य पद, चैतन्य इकाई के रूप में जीवन होना स्पष्ट हो चुका है।

किसी वस्तु को, किसी वस्तु की अपेक्षा में केवल नापा जा सकता है। नाप-तोल का सभी प्रबंधन, मानव सहज आवश्यकता व कल्पनाशीलता की उपज है। हर वस्तु अपने रूप, गुण, स्वभाव और धर्म तथा उसके वातावरण से संपूर्ण है। आकार, आयतन, घन को नापना संभव है। सभी गुणों को नापना सम्भव नहीं है। सम, विषम आवेशों को नापना संभव हुआ है। मध्यस्थ बल वर्तमान व स्वभाव गति के मूल में मध्यस्थ शक्ति का होना जाना जाता है। मध्यस्थ शक्ति को नापना संभव नहीं हो पाया है। जबकि मध्यस्थ शक्ति ही नियंत्रक है, इसे मानव समझ और समझा सकता है। इस आधार पर सम, विषम प्रभाव परस्परता में होना देखा जाता है। ऐसे प्रभावी क्रियाकलापों में मात्रात्मक परिवर्तन होना पाया जाता है। ये सब चीजें मानव में दृष्टा विधि से ही समझ में आती हैं। मानव में न्याय, धर्म, सत्य दृष्टियाँ और कल्पनाएँ भ्रमवश अस्पष्ट रहते हुए भी बहुत दूर-दूर तक दौड़ती हैं। इसी के आधार पर देखना बन पाता है। देखने का तात्पर्य समझना ही है। समझा नहीं तो देखा नहीं। - भ.व. 136

(E) काल

काल गणना, किसी क्रिया की अवधि के रूप में पहचानी गई है जैसे यह धरती अपने में सूर्योदय से सूर्योदय तक। काल का दृष्टा होने का तात्पर्य क्रिया, और क्रिया की अवधि, घटना, परिणाम, स्थिति, गति, अनंत, व्यापक का दृष्टा होने से है। इस प्रकार अस्तित्व दृष्टा भी मानव है। अस्तित्व सहज रूप में नित्य वर्तमान है। अस्तित्व अपने में न कोई शुरूआत है, न कोई अंत है। ग्रह गोलों के सम्बंध में वे कितनी संख्या में अस्तित्व में हैं इसकी आवश्यकता मानव जाति को नहीं है। जितनी आवश्यकता बनती है उतने में से कुछ ग्रह-गोलों को मानव समझने का प्रयत्न करता ही है। अभी तक इस धरती के मानव ने जो पता लगाने की कोशिश की है उसमें सकारात्मक सार्थक उद्देश्य कुछ भी नहीं रहा। इन प्रयासों के चलते दूरसंचार कार्य सार्थक हो गया। यही सकारात्मक भाग है। हर छोटी से छोटी या बड़ी से बड़ी वस्तु का अस्तित्व बना ही रहता है। – म.वि. 174-175

अर्थात्, वर्तमान के तुलना में ही भूत एवं भविष्य हैं।क्रिया के बिना काल नहीं है।वर्तमान कभी मिटता नहीं – संवाद, २००७.

देश, दिशा, काल: वस्तु स्थिति सत्य

मनुष्य अपनी दृष्टा पद प्रतिष्ठा में, देश, काल, दिशा को, सहज ही पहचानने व निर्वाह करने योग्य है। रासायनिक-भौतिक रचना में जो विस्तार दिखाई पड़ता है और एक रचना तथा दूसरी रचना की परस्परता में दिखने वाली दूरी पर, सह-अस्तित्व के रूप में देश है। इसका तात्पर्य यह है कि सत्ता में संपृक्त प्रकृति ही सह-अस्तित्व है। सत्ता रूप साम्य ऊर्जा परस्पर इकाइयों अथवा रचनाओं के बीच दिखने वाली दूरी है और सत्ता हर वस्तु में पारगामी परस्परता में पारदर्शी है। इस प्रकार देश, स्पष्ट हुआ। ऐसे देश में, रचना और इकाइयों की परस्परता में दिशा की स्थिरता है। क्योंकि ऊर्जा स्थिर है। सम्पूर्ण रचना और इकाइयां स्थिति और गति सहित व्यवस्था रूप में निश्चित और वर्तमान हैं। इसे

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