को पहचानने वाला जीवन ही है। ये सब अलग-अलग रहते हुए साथ-साथ होना ही सह-अस्तित्व का साक्षी है। - म.वि. 213
(G) व्यवस्था एवं समग्र व्यवस्था में भागीदारी
यहाँ इस मार्मिक मुद्दे को स्मरण दिलाने का तात्पर्य यही है कि छोटे से छोटे परमाणु अंश पहचानते हैं इसका साक्ष्य निश्चित संख्यात्मक परमाणु अंशों से गठित अथवा सम्मिलित कार्य रूप को परमाणु नाम से इंगित किया जा रहा है। सभी परमाणु इसी स्वरूप में विद्यमान गतिमान प्रकाशमान है। परमाणु के मूल वस्तु, परमाणु अंश एक दूसरे को पहचानने के आधार पर ही निश्चित कार्य को करने में प्रवृत्त निष्ठा उसकी निरंतरता का होना समझ में आता है। ये स्वयं परमाणु अंशों की प्रकाशमानता के साथ ही एक दूसरे के व्यवस्था के रूप में निश्चित आचरण को प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति उन उन परमाणु अंशों में ही निहित रहना स्वाभाविक है। इन परमाणुओं का अद्भुत तथ्य यह भी है कि ये नित्य प्रकाशमान हैं।
परमाणुओं के रूप में कार्यरत परमाणु अंशों के संख्या भेद से उन-उन का आचरण भिन्न-भिन्न होता हुआ भी समझ में आता है क्योंकि लोहा में लोहत्व के रूप में जो आचरण है उसका मूल स्रोत उस लोहा के रूप में कार्यरत परमाणु ही है। लोहा के रूप में जितना द्रव्य है उन सब के मूल में निश्चित एक जाति परमाणुओं का होना पाया जाता है क्योंकि परमाणु ही अणु के रूप में, अणु अणुपिंड के रूप में रहना पाया जाता है। इसी प्रकार प्रत्येक प्रजाति के पिंडों में निश्चित प्रजाति के परमाणु समाहित रहना स्पष्ट हो जाता है। इसी स्पष्टता के साथ एक दूसरे को पहचानने वाला क्रम वैभव परमाणु अंशों से ही स्रोत रूप में निहित रहना भी जागृत मानव को समझ में आता है। इसी के साथ यह भी समझ में आता है हर परमाणु अंश में ही व्यवस्था के रूप में कार्यरत रहने की प्रवृत्ति समायी रही है। इस विधि से छोटी से छोटी मात्रा जो निश्चित मात्रा है, परमाणु अंश का उसी मात्रा के स्वरूप में व्यवस्था के रूप में प्रकाशित होने का सूत्र समायी है इसका प्रमाण हर परमाणु व्यवस्था के रूप में होना ही है। यह समग्र व्यवस्था में भागीदारी करता है।
अर्थात् हर परमाणु व्यवस्था होते हुए अपने प्रजाति के परमाणुओं के साथ अणु, अणुओं से रचित पिंड के रूप में होना दृष्टव्य है। यही चरित्र और आचरण प्रवृत्ति प्रत्येक प्रजाति सहज परमाणु, अणु, अणुरचित पिंडों के रूप में भौतिक वस्तुएँ उपलब्ध है। इस प्रमाण से समग्र व्यवस्था में भागीदारी का सूत्र समझ में आता है। इसके आगे हर एक प्रजाति के रचना अपने अपने समूह के रूप में सहवास जैसे धातु समूह, पाषाण समूह, मिट्टी समूह, मणि समूह। - म.वि. 215-216
समग्र व्यवस्था में भागीदारी: सहअस्तित्व में स्वीकृति का सिद्घांत यही है - 'त्व’ सहित व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी, यह सह-अस्तित्व सहज अभिव्यक्ति है। इसलिए यह व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी होने का कार्य प्रणाली और फल परिणाम पहले से स्वीकृत है। इसका साक्ष्य यही है कि परमाणु को परमाणु का संघटित विघटित कार्य और परिणाम अस्तित्व में पूरकता विधि से स्वीकृति होना पाया जाता है। इसी प्रकार एक झाड़ और पौधा भी अपने बीजानुषंगीय विधि से रचना-विरचना के रूप में ही अपने कार्य और परिणाम को व्यक्त करता है।