समाहित होना एक से अधिक गतिपथ का होना भी होता है। जैसे-जैसे अंशों की संख्या बढ़ती जाती है वैसे-वैसे मध्य में भी अंश जमा होते जाते हैं। यह परमाणु में भार बन्धन का सूत्र है। सह-अस्तित्व विधि से अंश-अंशों के साथ कार्य करने की विधि स्पष्ट है। इसी प्रकार परमाणु, परमाणु के साथ और अणु, अणु के साथ सह-अस्तित्व को व्यक्त करने के क्रम में सह-अस्तित्व का प्रकाशन किये हुए है। अणुरचित रचना ही वृहद् रचना के रूप में ग्रह-गोल रूप में दृष्टव्य है।
यह पूर्णतया अस्तित्व सहज सह-अस्तित्व का नित्य प्रभावी कार्य है। परमाणु में विकास पूर्ण (गठनपूर्ण) होने के बाद अणुबंधन व भारबंधन से मुक्त हो जाते हैं। यही चैतन्य परमाणु जीवन पद में प्रतिष्ठित रहना पाया जाता है। ऐसे चैतन्य इकाई भार और अणुबन्धन से मुक्ति पाकर आशा बन्धन से अपने कार्य गतिपथ सहित पुंजाकार रूप में प्रतिष्ठित होना, ऐसे पुंजाकार का एक आकार होना, ऐसे आकार के एक शरीर रचना (पिण्डज या अण्डज विधि से) रचित रहना अस्तित्व सहज कार्यक्रम है। इसी कार्यक्रम के गति क्रम में मानव शरीर रचना भी एक स्वाभाविक क्रिया है। – आ.व. 177
‘जीवन’ का स्वरूप विकासपूर्णता के फलन में चैतन्य पद प्रतिष्ठा सहज एक परमाणु है जो भार बन्धन और अणुबन्धन से मुक्त है। यही ‘जीवन’ के नाम से सम्बोधित है।
जीवन में मन, वृत्ति, चित्त, बुद्घि और आत्मा अविभाज्य रूप में क्रियाशील है। ये सब निश्चित क्रियाओं के नाम हैं। ‘वस्तु’ के रूप में मध्यांश सहित चार परिवेशों के रूप में क्रियाशील इकाई है। इस प्रकार ‘जीवन’ अपने में चैतन्य पद प्रतिष्ठा सहित मानव परंपरा में समझदारी सहित परावर्तन-प्रत्यावर्तनपूर्वक जीवन-सहज क्रियाओं को प्रकाशित करता ही रहता है। यही जागृति है।
व्यवस्था की मूल वस्तु अस्तित्व में केवल परमाणु ही होना पाया गया है। सत्ता में संपृक्त प्रकृति ही जड़-चैतन्य के रूप में वैभवित है। इनमें से जड़ प्रकृति भारबन्धन और अणुबन्धन के फलस्वरूप भौतिक-रासायनिक रचनाओं में भागीदारी करता हुआ देखने को मिलता है। यही प्रत्येक जड़ परमाणु अपने में व्यवस्था और रचना सहज समग्र व्यवस्था में भागीदारी का साक्ष्य प्रस्तुत करता है। जबकि चैतन्य इकाइयाँ भारबन्धन और अणुबन्धन से मुक्त, आशा बन्धन से युक्त, ‘आशानुरूप कार्य गति पथ’ सहित मनोवेग के अनुपात में गतिशील रहना पाया जाता है। ‘जीवन’ अपने में गठन पूर्णता के उपरान्त अक्षय शक्ति, अक्षय बल सम्पन्न होना देखा गया है। यह ‘परिणाम के अमरत्व’ प्रतिष्ठा का फलन ही है। - आ.व. 73-15
प्रत्येक मानव जीवन रूप में ही समान है, यह बल-शक्ति, क्रिया और लक्ष्यों के रूप में समान होना देखा गया है। इसी आधार पर अर्थात् जीवन के आधार पर ही, जीवन-सहज क्रिया कलाप, प्रत्येक मनुष्य को समझ में आना सहज संभव है। जीवन में पांच आयाम, बल और शक्ति के रूप में, पहले से ही इंगित किया जा चुका है। जिसमें से मन जीवनबल है और आशा जीवनशक्ति है। इसी प्रकार वृत्ति-विचार, चित्त-इच्छा, बुद्घि-ऋतम्भरा और आत्मा-प्रामाणिकता के रूप में अध्ययन गम्य है। (सभी जीवन में १० क्रियाएं पाया जाता है)।- म.वि. 37