अविभाज्यता में यथार्थता और रूप, गुण, स्वभाव और धर्म के अविभाज्यता में हर वस्तु सहज सत्यता को पहचाना जाता है। इसी आशयों के आधार पर त्रिआयामी अध्ययन प्रत्येक एक के सम्पूर्णता के लिये सीढ़ियाँ अथवा क्रम समझा जाता है। इसी क्रम में पदार्थावस्था, प्राणावस्था, जीवावस्था और ज्ञानावस्था में वैभवित सम्पूर्ण वस्तुओं का अध्ययन सहज सुलभ है।

चारों अवस्थाओं में रूप आकार, आयतन, घनता के अर्थ में गण्य होता है। चारों अवस्थाओं का स्वरूप जड़-चैतन्य प्रकृति ही है। भौतिक-रासायनिक रूप में जड़ प्रकृति और जीवन सहज दस क्रियाओं के रूप में चैतन्य प्रकृति प्रमाणित होना पाया जाता है। इसी आधार पर ज्ञानावस्था चैतन्य प्रकृति में है ही, जड़ प्रकृति रूपी शरीर का संचालन जीवन ही सम्पन्न करता हुआ देखने को मिलता है। जीवावस्था में समृद्घ मेधस यथा सप्त धातुओं से रचित शरीर रचनाओं को जीवन संचालित कर पाता है। जीवावस्था और ज्ञानावस्था का अंतर इतना ही है कि जीवावस्था में शरीर रचना विधि के अनुसार (वंशानुषंगीयता) जीवन अपने को प्रकाशित करने में बाध्य है। जबकि ज्ञानावस्था के मानव में यह देखने को मिलता है कि कल्पनाशीलता, कर्मस्वतंत्रता विधि से कर्म करते समय स्वतंत्र और फल भोगते समय परतंत्र विधि से न्याय का अपेक्षा, सही कार्य-व्यवहार करने की इच्छा, सत्यवक्ता के रूप में शरीर यात्रा आरंभ काल से देखने को मिलता है। इसलिये मानव समझ के करने योग्य इकाई के रूप में दिखाई पड़ता है। यही संस्कारानुषंगीय इकाई होने का साक्ष्य है। इस मुद्दे पर हमारा सर्वेक्षण के अनुसार 99% सही उतरती है। यह भी हम अनुभव किये हैं कि हर सर्वेक्षण कार्य में परीक्षण, निरीक्षण क्षमता का जागृत रहना आवश्यक है। - स.श. 96

संस्कार शरीर-गत तथ्य न होकर, जीवन-गत तथ्य है। जीवन में सम्पूर्ण समझदारी का स्थान और प्रणाली है। शरीर में कोई ऐसा अंग, अवयव और इन्द्रियाँ नहीं हैं, जो जीवंतता के अभाव में ज्ञान इन्द्रियों की क्रियाएं सम्पन्न कर सके। ज्ञानेन्द्रियों में ऐसा कोई स्थान नहीं है जिसमें नियम, न्याय, समाधान, सत्य की प्यास हो। मेधस रचना में ऐसा कोई स्थान नहीं है जो श्रुति और स्मृति का धारक वाहक हो सके। शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध ये पांचों स्मृति के रूप में जीवन में ही प्रभावित रहते हैं। इसी क्रम में नियम, न्याय, धर्म और सत्य की प्यास है। जीवन तृप्त होने का, यही स्रोत है। नियम का प्रमाण, नियंत्रण, संतुलन सहित, पूरकता के रूप में है। नियंत्रण और संतुलन स्वभाव गति के रूप में देखा जाता है। देखने का कार्य समझना है, समझने का कार्य जीवन में है। जीवन में ही जानने, मानने, पहचानने का सम्पूर्ण वैभव समाहित रहता है। मानव परम्परा के रूप में प्रमाणित होने के क्रम में, शरीर के द्वारा निर्वाह सम्पन्न होना पाया जाता है। इससे शरीर की महत्ता एवं प्रयोजन स्पष्ट हो जाता है कि मानव परम्परा में प्रमाणित होने के क्रम में, एक आवश्यकीय अनिवार्य माध्यम है। -म.वि. 18,22

(D) प्रत्येक मानव में ‘चैतन्य जीवन’ समान है

हर विकासशील परमाणु भारबन्धन और अणुबन्धन सहित कार्य करता है। हर विकासशील परमाणु सत्ता में ही क्रियाशील रहना पाया जाता है। हर परमाणु गठनपूर्वक ही परमाणु है। गठन का स्वरूप मध्यांश और आश्रित अंश के रूप में होना व निश्चित दूरी में होना सह-अस्तित्व सहज कार्यशीलता है। आश्रित अंश मध्यांश के सभी ओर चक्राकार में गतिशील रहना होता है। इसीलिये हर परमाणु गतिपथ (परिवेश) सहित परमाणु है। इनमें अंशों का अधिकाधिक

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