(C) मानव संस्करानुषंगी इकाई है

मानव वंशानुषंगीय विधि से नियंत्रित नहीं होता जबकि सभी जीव होते हैं:- मानव अपनी मौलिकता को स्वयं पहचानते हुए अपने आचरण, विचार, व्यवहार, व्यवस्था को अक्षुण्ण बनाए रखना चाहता है। यह हर मानव सहज मौलिकता की महिमा और गरिमा है। मानव जागृति पूर्वक दृष्टा पद प्रतिष्ठा में है, इसलिए अपनी मौलिकता को पहचानना एक आवश्यकता हो गई है। मानवेतर जीवों में वंशानुषंगीय विधि से जीवन सम्मति के साथ नियंत्रित रहना, संतुलित रहना देखा जा रहा है। जबकि मानव ने अपने ही इतिहास के अनुसार वंशानुषंगीय विधि से नियंत्रित होना स्वीकारा ही नहीं। पहले इस तथ्य पर ध्यान दिया जा चुका हैं कि मानव अपने इतिहास के अनुसार बहुआयामी है। इसको मानव में ही घटित होना देखा गया और किसी जीव में इस प्रकार की घटना नहीं हुई। इस क्रम को देखने पर पता चलता है कि मानव का बहुआयामी इतिहास का आधार होना स्वयं वंशानुषंगीयता को नकारने की ही गवाही है। यह भी मानव परंपरा की एक मौलिकता है। मानव परंपरा भी मौलिक है।

मानव शरीर का अवतरण, अवतरण क्रम, कारण, जीव शरीर अवतरण क्रम:-आदि मानव अपने अभिव्यक्ति क्रम में, किसी भी जीव, जानवर के गर्भाशय से भले ही पैदा हुआ हो, मानव की अभिव्यक्ति समझदारी के आधार पर प्रमाणित करने के क्रम में स्पष्ट है। इसके मूल में जाने पर पता चलता है कि जो रचना सूत्र विधि सहज भ्रूण है- मूल रूप में कार्यरत रहते हैं, वह किसी भी वंश के पूर्ववत् भी सृजित रहते हैं। जब कभी भी वंश बदलना है या समोन्नत होना है, उस स्थिति में पूर्व रचना सूत्र से, भिन्न रचना सूत्र बनता है। इसका मूल वंशानुषंगीयता को निर्वाह करता हुआ शरीर रचना के रूप में विभिन्न प्रकार के शरीर मानव के अवतरण के पहले से ही तैयार हो चुके रहे हैं। मानव शरीर रचना का आरंभिक स्वरूप किसी जीव योनि से माना जाना संभव है। ऐसा होते हुए भी, उस वंश का, अर्थात् इसके पीछे के वंश का कोई स्वीकृति मानव परंपरा में शुरुआत से ही नहीं हो पाई। यह घटना केवल मानव के आने के बाद ही शुरु हुई ऐसी बात भी नहीं है।

इसके पहले भी कई बार जीवों की शरीर रचना बदली है। यह आज भी गवाही के रूप में देखने को मिल रहा है। यह अनुमान किया जा सकता है कि अभी जितनी प्रजातियों के रूप में जीव संसार दिखाई पड़ रहा है, यह सब एक ही साथ नहीं जन्मा है। क्योंकि अब हमें अच्छी तरह से पता लग चुका है कि जीव शरीर रचना में परिवर्तन होने के लिए, जीव शरीर रचना सूत्र में ही पहले से स्थित अनुकूल भ्रूण संवर्धन आशय (गर्भाशय या गर्भ जैसी परिस्थिति) में पलना आवश्यक रहता ही है। यदि पूछा जाय कि यह क्यों बदलता है? तो इसका उत्तर है- ''सामन्जस्य रूप में।” ऐसे सामन्जस्य का आधार रचना क्रम में जीवन जागृति क्रम में, मानव शरीर रचना के उपरान्त ही प्रमाणित होना पाया जाता है। - भ.व. 228-229

अस्तित्व में सम्पूर्ण वस्तु है। वस्तु का अभिप्राय वास्तविकता को वर्तमान में प्रकाशित करना है। वस्तु जैसा है वही उसकी वास्तविकता है। हर वस्तु अपने में सम्पूर्ण होना पाया जाता है। हर वस्तु अपने सम्पूर्णता में ही वस्तु है। हर वस्तु अपने संपूर्णता में यथार्थता, वास्तविकता और सत्यता के रूप में है। कोई भी वस्तु का नाश नहीं होता है इसीलिये अस्तित्व सहज सत्यता प्रमाणित है। रूप और गुण के अविभाज्यता में वास्तविकता; रूप, गुण और स्वभाव के

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